*वेद ईश्वरीय ज्ञान*
*वेदान्त दर्शन -* *महर्षि व्यास मुनि*
*शास्त्रयोनित्वात् ।* अध्याय 1 । पाद 1 । सूत्र 3 ।।
( शास्त्रयोनित्वात् ) वेद=शास्त्र का कारण होने से=पाया जाता है कि सब जगत् के स्थूल सूक्ष्म पदार्थों का तथा सब विद्याओं के बीज रूप भण्डार वेद शास्त्र का कर्त्ता वा प्रकाशक ब्रह्म है ।
*अत एव च नित्यत्वम् ।* 1।3।29।।
(अतः) इससे ( एव ) ही ( नित्यत्वम् ) नित्यता है । नित्यता का अर्थ यह अखण्डनीयता है । प्रत्यक्षानुमानादि सब, शब्द प्रमाण=वेद खे सहायक हैं , अत एव वह खण्डित नहीं हो सकता ।
*प्रश्न-* तो क्ये वेद प्रलय में रहते हैं वे तो प्रति सृष्टि के आरम्भ में नये सिरे से उत्पन्न होते है ?
*उत्तर - समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ।।* 1।3।30।।
( समाननामरूपत्वात् ) एक से नाम और रूप होने से ( आवृत्तौ ) बार बार आवृत्ती में ( अपि ) भी ( अविरोधः ) विरोध नहीं ( च ) और ( स्मृतेः ) स्मृति के ( दर्शनात् ) देखने से भी ।
स्मृत्यादि ग्रंथों में भी और वेदों में भी देखा जाता है कि प्रलय के पश्चात सृष्टि की आवृत्ति में वेद और जगत् पूर्व सृष्टि के समान नाम और रूप वाला होता है । इस सृष्टि में जैसा वेद का शब्द अर्थ और सम्बन्ध देखा जाता है , वैसा ही पूर्व सृष्टि के समान ही होते हैं ।
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*वैशेषिक दर्शन -* *महर्षि कणाद मुनि*
*तद्वचनादान्मायस्य प्रामाण्यम् ।।* 1।1।3।।
(तद्वचनात् ) उस वेदप्रकाशक ऋषि=परमात्मा के उपदिष्ट होने से ( आन्मायस्य ) वेद भखशान् का ( प्रामाण्यम् ) स्वतः प्रामाण्य है ।
क्योंकि वेदादि शास्त्र धर्म का वर्णन करते हैं । इस कारण लोक उसको प्रमाम मानता है । यदि वेदादि शास्त्र में अभ्युदय और मोक्ष के साधन धर्म का वर्णन न होता तो लोक उसको निरर्थक जानकर प्रमाण न करता परंतु वेदादि शास्त्र में धर्म का निरूपण है और धर्म मनुष्य के ऐहिक आमुष्मिक कल्याण का साधन है, इसलिये लॉज वेदादि शास्त्र में प्रामाण्य-बुद्धि रखता है और रखनी चाहिये भी ।
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*न्याय दर्शन -* *महर्षि गौतम मुनि*
*मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् ।।* 2।1।39।।
(मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवत् च) और वेद का मन्त्रभाग तथा आयुर्वेद के प्रमाण होने के समान भी ( तत्प्रामाण्यम् ) उस सम्पूर्ण वेद शब्द में प्रमाणता है; ( आप्तप्रामाण्यात् ) वेदवक्ता पुरुष के प्रमाण होने से ।
इस सूत्र के भाष्य में वात्स्यायन मुनि ने वेदों का नित्य होना स्पष्ट प्रतिपादन किया है कि जो आप्त लोग हैं वेदों के अर्थ की देखने दिखाने और जनाने वाले हैं । जी उस मन्त्र के अर्थ के दृष्ट वक्ता होते हैं, वे ही आयुर्वेद आदि के बनाने वाले हैं। जैसे उनका कथन आयुर्वेद में सत्य हैं वैसे ही वेदों के नित्य मानने का उनका जो व्यवहार सो भी सत्य ही है, ऐसा मानना चाहिये । क्योंकि जैसे आप्तों के उपदेश का प्रमाण अवश्य होता है, वैसे ही सब आप्तों का भी जो परम् आप्त सबका गुरु परमेश्वर है उसके किये वेदों का भी नित्य होने का प्रमाण अवश्य ही करना चाहिये ।
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*योगदर्शन-* *महर्षि पतंजलि मुनि*
*स एष पूर्वेषामपि गुरु कालेनानवच्छेदात ।।* 22।6।।
(सः एष) वह पूर्वोक्त ईश्वर पूर्वजों का भी गुरु है, काल से उसका बाध न होने के कारण, सूत्र में पूर्व शब्द से अभिप्राय अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा महर्षियों का है। सृष्टि के आदि में जिनके हृदयों में ईश्वर वेदों का प्रकाश करता है, पूर्वज शब्द सबसे प्रथम जन्म होने के कारण उनके लिये आता है ।
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*संख्या दर्शन -* *महर्षि कपिल मुनि*
*यस्मिन्नदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजाते तत्पौरुषेयम् ।।* 5।50।।
(यस्मिन्-अदृष्टे-अपि) जिस अदृष्ट वस्तु में भी (कृतबुद्धि) पुरुषकृतत्व बुद्धि -पुरुष द्वारा की गई है ऐसी बुद्धि -पुरुष का कार्य होने की बुद्धि (उपजाते) निश्चित हो जावे (तत्पौरुषेयम्) वह पुरुषकृत जानना चाहिये, वैसै वेद नहीं हैं वे प्रादुर्भूत हुये ज्ञान दृष्टि से नित्य हैं ।
*अतः निजशक्त्येभिव्यक्ते: स्वतः प्रामाण्यम् ।।* 5 ।51।।
(निजशक्त्यभिव्यक्ते:) वेदों के कृतत्व के आभाव में मनुष्यकृत न होने पर निजशक्ति से शाश्वती स्वाभाविक शक्ति से अभिव्यक्ति होने प्रादुर्भूत होने से । जैसा कहा है- *' अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः ।। '* शतपर 14।5।4।10।। इस महान् परमात्मा के निःश्वास की भांति स्वाभाविक रुप में प्रकट हुये ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद हैं । *' स्वभाविकी ज्ञानबलक्रिया च । '* श्वेताश्वेतर 6।8 परमात्मा की ज्ञान क्रिया स्वाभाविक है । अतः वेदों का ( स्वतः प्रमाण्यम् ) स्वतः प्रमाणत्व है ।
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*मीमांसा दर्शन-* *महर्षि जैमिनि मुनि*
*नित्यस्तु स्याद् दर्शनस्य परार्थत्वात् ।।* 1।1।28।।
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के वेद नित्यत्व विषय में महर्षि दयानंद सरस्वती जी इस सूत्र पर लिखते हैं - ' शब्द में अनित्य होने की शंका आती है, उसका 'तु' शब्द से निवारण किया है । शब्द नित्य ही है, अर्थात् नाशरहित है, क्योंकि उच्चारण क्रिया से जो शब्द का श्रवण । होता है सो अर्थ के जानने ही के लिये है, इससे शब्द अनित्य नहीं हो सकता । जो शब्द का उच्चारण किया जाता है, उसकी ही प्रत्यभिज्ञा होती है कि श्रोत्र द्वारा ज्ञान के बीच में वही शब्द स्थिर रहता है, फिर उसी शब्द से भी अर्थ की प्रतीति होती है । जो शब्द अनित्य होता है तो अर्थ का ज्ञान कौन करता, क्योंकि वह शब्द ही नहीं रहा, फिर अर्थ को कौन जनावे । और जैसे अनेक देशों मे अनेक पुरुष एक काल में ही एक गौ शब्द का उच्चारण करते हैं, इसी प्रकार उसी शब्द का उच्चारण बारम्बार भी होता है, इस कारण से भी शब्द नित्य है । जो शब्द अनित्य होता तो यह व्यवस्था कभी नहीं बन सकती । सो जौमिनि मुनि ने इस प्रकार के अनेक हेतुओं से पूर्वमिमांसा शास्त्र में शब्द को नित्य सिद्ध किया है ।
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*नागराज आर्य*
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क्या श्रीराम आमिष-भोजी थे?
- कार्तिक अय्यर
।।ओ३म्।।
सनातन धर्म पर आक्षेप करने वाले लोग भगवान् रामचंद्र आदि महापुरुषों पर आमिष भोजन का आक्षेप करते हैं।
वाल्मीकीय रामायण में एक प्रकरण मे, उनको रामचंद्र जी के मांसाहार करने का हेतु मिलता है। वह प्रकरण कुछ इस प्रकार है-
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
कन्द मूल फलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् !! –वा, रा २/२०/२९,
यहां पर महाभारत १२/१७/२ और मत्स्यपुराण ६/४९ के हवाले से "आमिष" का अर्थ "कामभोग,इच्छा" ऐसा ग्रहण हुआ है। तो क्या ये अर्थ नहीं हो सकता कि राम जी के अनुसार-"वे ऋषि मुनियों की तरह आमिष का, यानी किकामभोगों का त्याग करके १४ वर्षों तक रहेंगे?
यहां पर आमिष का अर्थ "जंबिरा" नामक कोई फल है। तो फिर केवल मांस,गोश्त ही अर्थ किसलिये कि़ा जाये?
अब हम रामायण के उत्तरकांड से ही एक शब्दप्रयोग दिखाते हैं:-
-
आमिषं यच्च पूर्वेषां राजसं च मलं भृशम् ।
अनृतं नाम तद्भूतं क्षिप्तेन पृथिवीतले ॥
७/७४/१७ ( रामायण उत्तरकांड , सर्ग ७४ श्लोक १७ गीताप्रेस संस्करण)
यहां वैश्यों की जीविका वृत्ति , जो 'अनृत' है,रजोगुण धर्म मिश्रित है को -"आमिष" कहा गया है । तब हम आमिष का अर्थ मांस ही क्यों करें?
हम एक ठोस प्रमाण रामायण से ही देकर अपनी प्रतिज्ञा को सिद्ध करते हैं:-
हनुमानजी जब जानकी जी से लंका में मिले तो उन्होंने श्रीराम के विषय में माँ से बतलाया कि प्रभु राम आपके वियोग में मांसभक्षण नहीं करते और न ही मद्यपान और न अपने शरीर से मच्छर या कीड़े आदि को ही हटाते हैं क्योंकि उनका मन आपमें ही लगा रहता है नित्य ही शोक में डूबे रहते हैं ! देखें श्लोक — न मांसं राघवो भुंक्ते न चैव मधु सेवते !
नैव दन्सान् न मशकान् न कीटान् न सरीसृपान्! राघवोपनयेद् गात्राद् त्वद्गतेनान्तरात्मना | —सुन्दरकांड –३६/४१-४२-४३, –
"कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधु का सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओं का सेवन क्यों करते?"
( गीताप्रेस वाल्मीकीय रामायण टीका,भाग-२ सुंदरकांड सर्ग ३६, श्लोक ४१ , पृष्ठ १३७)
।।मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम चंद्र की जय।।
१:- वाल्मीकीय रामायण- गीताप्रेस टीका
२:- आप्टे-मोनियर शब्दकोश- विकिस्रोतः से साभार
शूर्पणखा की सुंदरता और श्रीराम की सत्यवादिता
शूर्पणखा की 'सुंदरता' और श्रीराम की सत्यवादिता
- कार्तिक अय्यर
।।ओ३म्।।
कई लोग श्रीराम पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने न केवल शूर्पणखा जैसी 'सुंदर और सुशील' स्त्री को त्याग दिया, अपितु ये झूठ भी बोला कि मेरा छोटा भाई 'लक्ष्मण अविवाहित है, उससे विवाह कर लो।
आइये, वाल्मीकीय रामायण में देखते हैं कि इनमें कितनी सच्चाई है।
।।शूर्पणखा का सौंदर्यवर्णन।।
सुमुखं दुर्मुखी रामं वृत्तमध्यं महोदरी।
विशालाक्षं विरूपाक्षी सुकेळं ताम्रभूर्धजा।।
प्रतिरूपं विरूपा सा सुस्वरं भैरवस्वरा।
तरणं दारुणं वृद्धा दक्षिणं वामभाषिणी।।
न्यायवृत्तं सुदुर्वृत्ता प्रियमप्रियदर्शना।
शरीरजमाविष्टा राक्षसी वाक्यमब्रवीत्।।
( अरण्यकांड सर्ग १७)
"श्रीराम सुंदर मुख वाले थे पर वो राक्षसी दुर्मुखी थी। राम का पेट सुडोल था और वह बड़े पेड़ वाली थी ।राम के नेत्र विशाल थे और उसकी आंखें भद्दी थी। श्रीराम के केश काले चिकने और सुंदर थे तो उस राक्षसी के बाल ताम्र वर्ण के और भद्दे थे। राम देखने में सुंदर और प्रिय थे तो वह राक्षसी महा कुरूपा थी। राम का स्वर कोमल और मधुर था तो उस राक्षसी का स्वर महा कर्कश था ।राम युवा थे तो वह महा वृद्धा थी राम मधुर भाषी थे तो वह कटु भाषा नहीं थी श्रीराम सदाचारी थे तो वह अत्यधिक दुराचारिणी थी राम प्रियदर्शी थे तो वह अ प्रियदर्शनी थी।"
ये है शूर्पणखा माता का "मिस वर्ल्ड " जैसा रूप।
यहां हमारे मित्र अभिलाष आनंद चुटकी लेकर कहते हैं कि "वाल्मीकि ने भी वामभाषिणी कहकर शूर्पणखा को आधुनिक वामपंथी महिलावदी औरतों की ओर संकेत किया है।
शूर्पणखा इसी सर्ग में कहती है:-
अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी।
अरण्यं विचरामीदमेका सर्वभयंकरः।।
"मेरा नाम शूर्पणखा है। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने वाली राक्षसा हूं। सबको संत्रस्त करके इस वन में घूमा करती हूं।।
शूर्पणखा एक गैंगस्टर थी। सबको त्रस्त करते हुये घूमा करती थी।
सबसे बड़ी बात वो कुरूप,कर्कशा,भयंकर,भद्दी शक्ल वाली और बुढ़िया थी। वो राम जैसे व्यक्ति पर डोरे डाल रही थी जो उसके बेटे के समान थे। राम से प्रणय निवेदन करना केवल और केवल कामपिपासा थी। वरना कभी राम कभी 'लक्ष्मण के पल्ले न जाती। न ही सीता पर जानलेवा वार करने दौड़ती
।
इसलिये व्यर्थ में शूर्पणखा के सौंदर्य और चरित्र की वकालत करके राम को दोषी न कहें।
।।श्रीराम की सत्यवादिता ।।
हां, अब कुछ लोग बोलते हैं कि श्रीराम ने क्यों झूठ कहा कि लक्ष्मण अविवाहित है। तो ये श्लोक देखिये:-
श्रीमानकृतदारश्च 'लक्ष्मणो नाम वीर्यवान।।
( अयोध्याकांड| १८/३)
यहां अकृतदारः का अर्थ गोविंदराज टीकाकार " असहकृत दारः" करते हैं, यानी 'जिसके साथ वर्तमान में स्त्री न हो"। ये ठीक ही है, क्योंकि 'लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला १३ साल से अयोध्या में थी,उनको लंबे समय से पत्नी का साथ नहीं मिला था इसलिये उनको "असहकृतदारः" कहना गलत नहीं है। इसलिये श्रीराम को झूठ बोलने का आरोप लगाना अयुक्त है।
मूर्ख तो वो लोग हैं जो टीकाओं को देखे बिना ही राम को झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं।
अतः बिना सोचे विचारे आक्षेप करने से परहेज करें, ऐसा न हो कि पोल खुलने पर मुंह छुपाने की भी जगह न मिले।
।।ओ३म्।।
अथ पेरियार दर्प भंजनम्* सच्ची रामायण का जवाब -१ –
अथ पेरियार दर्प भंजनम्
सच्ची रामायण का जवाब -१
– कार्तिक अय्यर
नमस्ते मित्रों! पिछली पोस्ट में हमने प्रस्तावना तथा पेरियार रचित पुस्तक “सच्ची रामायण” का खंडन करने का उद्देश्य लिखा था। अब इस लेख में पेरियार जी के आक्षेपों का क्रमवार खंडन किया जाता है। परंतु इसके पहले ग्रंथ प्रमाणाप्रमाण्य विषय पर लिखते हैं।
१: वाल्मीकीय रामायण– वाल्मीकि मुनिकृत रामायण श्रीरामचंद्र जी के जीवन इतिहास पर सबसे प्रामाणिक पुस्तक है। महर्षि वाल्मीकि राम जी के समकालीन थे अतः उनके द्वारा रचित रामायण ग्रंथ ही सबसे प्रामाणिक तथा आदिकाव्य कहलाने का अधिकारी है। अन्य रामायणें जैसे रामचरितमानस, चंपूरामायण, भुषुंडि रामायण, आध्यात्म रामायण,उत्तररामचरित ,खोतानी रामायण, मसीही रामायण, जैनों और बौद्धों के रामायण ग्रंथ जैसे पउमचरिउ आदि बहुत बाद में बने हैं । इनमें वाल्मीकि की मूल कथा के साथ कई नई कल्पनायें, असंभव बातें, इतिहास ,बुद्धि ,तथा वेदविरोधी बातें समावेश की गई हैं। रामायण की मूल कथा में भी काफी हेर-फेर है। साथ ही स्वयं वाल्मीकि रामायण में भी काफी प्रक्षेप हुये हैं। अतः वाल्मीकि रामायण श्रीरामचंद्रादि के इतिहास के लिये परम प्रमाण है तथा इसमें मिलाये गये प्रक्षेप इतिहास,विज्ञान,बुद्धि तथा वेदविरुद्ध होने से अप्रमाण हैं ।अन्य रामायणें तब तक मानने योग्य हैं जब तक वाल्मीकि की मूल कथा से मेल खाये। अन्यथा उनका प्रमाण भी मानने योग्य नहीं।
२:- *महाभारत में वर्णित रामोपाख्यानपर्व* तथा *जैमिनीय अश्वमेध* :- महाभारत में रामोपाख्यान का वर्णन है तथा जैमिनीय अश्वमेध में भी । चूंकि महाभारत महर्षि वेदव्यास रचित है परंतु राम जी के काल का बना हुआ नहीं है और महाभारत में प्रक्षेप होने से पूर्णतः शुद्ध नहीं है, तथापि आर्षग्रंथ होने से इसका *अंशप्रमाण* मान्य होगा। यही बात जैमिनीय अश्वमेध पर भी लागू होती है।
३:- *उत्तरकांड* पूर्ण रूप से प्रक्षिप्त तथा नवीन रचना है। यह वाल्मीकि मुनि ने नहीं रचा है। क्योंकि युद्धकांड के अंत में ग्रंथ की फल-श्रुति होने से ग्रंथ का समापन घोषित करता है। यदि उत्तरकांड लिखी होता तो वाल्मीकि जी उत्तरकांड के अंत में फल श्रुति देते। इस कांड में वेद,बुद्धि,विज्ञान तथा राम जी के मूल चरित्र के विरुद्ध बातें जोड़ी गई हैं। साथ ही राम जी पर शंबूक वध,सीता त्याग,लक्ष्मण त्याग के झूठे आरोप,रावणादि की विचित्र उत्पत्ति,रामजी का मद्यपान आदि मिथ्या बातें रामजी तथा आर्य संस्कृति को बदनाम करने के लिये किसी दुष्ट ने बनाकर मिला दी हैं। अतः उत्तरकांड पूरा का पूरा प्रक्षिप्त होने से खारिज करने योग्य तथा अप्रामाणिक है। उत्तरकांड की
प्रक्षिप्त होने के विषय में विस्तृत लेख में आंतरिक तथा बाह्य साक्ष्यों सहित लेख दिया जायेगा। फिलहाल उत्तरकांड अप्रामाणिक है, ऐसा जान लेना चाहिये ।
४:- *वेद* – वेद परमेश्वर का निर्भ्रांत ज्ञान है। ऋक्,यजु,साम तथा अथर्ववेद धर्माधर्म निर्णय की कसौटी हैं। वेद तथा अन्य ग्रंथों में विरोध होने पर वेद का प्रमाण अंतिम कसौटी है। अतः रामायण की कोई बात यदि वेद सम्मत हो तो मान्य हैं, वेदविरुद्ध होने पर मान्य नहीं। यदि रामायण के किसी भी चरित्र के आचरण वेदसम्मत हों,तभी माननीय हैं अन्यथा नहीं।
५:- कोई भी पुस्तक चाहे मैथिलीशरण गुप्त रचित *साकेत* हो अथवा कामिल बुल्के रचित *रामकथा* , वे हमारे लिये अप्रमाण हैं। क्योंकि मैथिलीशरण जी, फादर कामिल बुल्के आदि सज्जन ऋषि-मुनि नहीं थे/हैं और न ही श्रीराम के समकालीन ही हैं जो उनका सच्चा खरा इतिहास लिख सके। अत: *आर्यसमाज के लिये यह सभी ग्रंथ अनार्ष होने से अप्रमाण हैं।इन ग्रंथों के प्रमाणों का उत्तरदायी आर्यसमाज या लेखक नहीं है* ।
*निष्कर्ष*- *अतः यह परिणाम आता है कि ऐतिहासिक रूप में वाल्मीकि रामायण परमप्रमाण तथा धर्माधर्म के निर्णय में चारों वेद( ऋक्, यजु,साम तथा अथर्ववेद)परमप्रमाण हैं। अन्य आर्ष ग्रंथ जैसे महाभारतोक्त रामोपाख्यान आदि आर्ष व परतः प्रमाण हैं। मानवरचित ग्रंथ जैसे साकेत,कैकेयी,रामकथा,पउमचरिउ,उत्तरपुराण आदि ग्रंथ अप्रमाण हैं क्योंकि ये अनार्ष , नवीन तथा कल्पित हैं।*
जारी……….
अब पेरियार साहब के आक्षेपों का क्रमवार उत्तर लिखते हैं।
*भूमिका* शीर्षक से लिखे लेख का उत्तर:-
*प्रश्र-1* – *रामायण किसी ऐतिहासिक कथा पर आधारित नहीं है। यह एक कल्पना तथा कथा है।……रावण लंका का राजा था।। १।।* ( मूल लेख चित्र में देखा जा सकता है।हम केवल कुछ अंश उद्धृत करके खंडन लिख रहे हैं)
*समीक्षक:-* धन्य हो पेरियार साहब! यदि रामायण नामकी कोई घटना घटी ही नहीं थी तो आपने इस पुस्तक को लिखने का कष्ट क्यों किया?जब आपके पास निशाना ही नहीं है तो तीर किस पर चला रहे हैं।
उस घटना पर,जिसे आप सत्य नहीं मानते पर अनर्गल आक्षेप लगाकर जनसामान्य को दिग्भ्रमित करना किसी सत्यान्वेशी अथवा विद्वान का काम नहीं हो सकता। आपके अनुसार यदि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता,हनुमान आदि महामानव यदि काल्पनिक थे तो परस्त्रीगामी,कामी,दुराचारी रावण महात्मा,सच्चा भक्त, सच्चा संत व आदर्श कैसे हो गया? जब पूरी रामायण ही काल्पनिक है तो फिर विवाद कैसा? या तो पूरी रामायण को सच्ची घटना मानिये अन्यथा रावण को पूर्वज मसीहा आदि लिखकर राजनीतिक रोटियां सेंकने का प्रयास न करें। यहां हम अंबेडकर साहब के अनुयायी मित्रों से यह पूछना चाहते हैं कि एक ओर वे रावण को अपना वीर पूर्वज मानकर उसको आदर्श मानते हैं, वहीं उनके दूसरे नेता पेरियार साहब पूरी रामायण को काल्पनिक कहकर रावण को भी काल्पनिक सिद्ध कर रहे हैं। अहो मूलनिवासी मित्रों! आपके दोनों नेताओं में से आप किसकी बात मानेंगे? यह फैसला हम आप पर छोड़ते हैं।
आगे रामायण के ऐतिहासिक होने के प्रबल साक्ष्य दिये जायेंगे। किसी पेरियार भक्त में सामर्थ्य हो तो उचित तर्क-प्रमाण से रामायण को काल्पनिक सिद्ध करे।
*प्रश्न*:- पेरियार जी ने रामायण को उपन्यास मानकर लेखनी चलाई। इसमें क्या आपत्ति है?
*उत्तर*:- यदि उपन्यास माना है तो रावण भी स्पाइडर मैन ,बैटमैन,सुपरमैन जैसे काल्पनिक पात्रों से बढ़कर कोई हैसियत नहीं रखता। तो आप लोग उसे अपना आदर्श पूर्वज क्यों कहते हो? और एक उपन्यास के पात्रों पर लेखनी चलाकर लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तथा आर्य-द्रविड़ राजनीति का मंतव्य साधना क्या धूर्तता की श्रेणी में नहीं आता? यदि उपन्यास मानते हो तो धर्म को घसीटकर दलित-आर्य का कार्ड खेलकर समाज में वैमनस्य क्यों फैलाया? अतः इस पुस्तक को लिखना न केवल अनुचित है, अपितु धूर्तता भी है।
सच्ची रामायण खंडनम्
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नास्तिक मत खंडन भाग २
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