(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य मंडनम्- भाष्य-२) क्या दयानंद-भाष्य में मुँह से वीर्य लेने की अश्लीलता है?


(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य मंडनम्- भाष्य-२)
क्या दयानंद-भाष्य में मुँह से वीर्य लेने की अश्लीलता है?
- कार्तिक अय्यर
दिनांक- ३/०९/२०२०
।।ओ३म्।।

नमस्ते पाठकों!
[पाठकों!लगभग पाँच सालों पहले कुंदन कुमार उर्फ उपेंद्र कुमार 'बागी' ने चु....र्थप्रकाश यानी 'सत्यानाश प्रकाश' नामक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक में महर्षि दयानंद के यजुर्वेद भाष्य, उनके जीवनचरित्र और सत्यार्थप्रकाश पर असफल और पुरानी घिसी पिटी पौराणिक लेखकों की किताबों के अनुसार खंडन करने का कुप्रयास किया गया।
२०१५ के समय में श्री नटराजजी, श्री विपुल जी, श्री सुशील जी , श्री रजनीश जी और हमने पौराणिकों के आक्षेपों के उत्तर दिये। इनके खंडन में 'प्यारा ऋषि' और 'पौराणिक गप्प खंडन' नामक ब्लॉग भी बनाये। इन लोगों के मुखिया कुंदन पानवाले ने 'आर्यमंतव्य' की देखादेखी 'हिंदूमंतव्य ' ब्लॉग बनाया और अपने पौराणिक लेखकों की किताबों के आधार पर और गालीगलौच जोड़कर लेख लिखे। उसी ब्लॉग की सामग्री उपरोक्त किताब में है। उस ब्लॉग का प्रयोग मुसलमान कर सकते हैं, और करते भी हैं- यह बताने पर और हमारे अपने ब्लॉग मिटाने पर भी पौराणिक पीछे नहीं हटे और हिंदूमंतव्य को चलाये रखा। परंतु अब फेसबुक पर पौराणिकों का महर्षि दयानंद के विरुद्ध विषवमन अति हो गया है।
अब हम कम-से-कम यजुर्वेद भाष्य पर किये आक्षेपों का खंडन जरूर करेंगे। इसलिये एक-एक कर लेख पढ़ें।]

  हमने प्रथम भाग में यजुर्वेद २५/७ भाष्य पर चर्चा की थी। उसका कोई संतोषजनक लेखबद्ध उत्तर पौराणिक पोपमंडल की ओर से नहीं आया। अब इसी श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं।

प्रश्न-२-
शादं दद्भिर् अवकां दन्तमूलैर् मृदं बर्स्वैस् तेगान्दम्ंष्ट्राभ्याम्ं सरस्वत्या ऽ अग्रजिह्वं जिह्वाया ऽ उत्सादम् अवक्रन्देन तालु वाजम्ँहनुभ्याम् अप ऽ आस्येन वृषणम् आण्डाभ्याम् आदित्याम्ँ श्मश्रुभिः पन्थानं भ्रूभ्यां द्यावापृथिवी वर्तोभ्यां विद्युतं कनीनकाभ्याम्ं शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्य् अवार्या ऽ इक्षवो वार्याणि पक्ष्माणि पार्या ऽ इक्षवः॥ ~यजुर्वेद {अध्याय २५, मंत्र १}

दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि---
"हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए ज्ञानी जन! ,,,,,,,,,//////(आण्डाभ्याम्)- वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करनेहारे आण्डों से, (वृषणम्)- वीर्य वर्षानेवाली अंग {लिंग} को, (श्मश्रुभि:)- मुख के चारों ओर जो केश, अर्थात डाढ़ी उससे,,,,,,,,, /////वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहिए


उत्तर-
पाठकों! पौराणिक धूर्तशिरोमणि कुंदर कुमार पानवाले ने यहाँ जानबूझकर आधा-अधूरा भाष्य देकर महर्षि दयानंद पर आक्षेप किया है। इनके दिये अर्थ के अनुसार 'वीर्य वर्षाने वाले अंग,यानी आंडों और लिंग को मुख के चारों ओर लेना है।'

यहाँ पर प्रथम तो हम पंडितों द्वारा बनाया महर्षि दयानंद का भाष्य देते हैं-

"पदार्थ:-हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए विद्यार्थी जन ! (ते) तेरे (दद्धिः) दांतों से (शादम्) जिस में छेदन करता है, उस व्यवहार को (दन्तमूलैः) दांतों की जड़ों और (बस्र्वैः) दांतों की पछाड़ियों से (अवकाम्) रक्षा करने वाली (मृदम्) मट्टी को (दंष्ट्राभ्याम्) डाढ़ों से (सरस्वत्यै) विशेष ज्ञान वाली वाणी
के लिये (गाम्) वाणी को (जिह्वायाः) जीभ से (अग्रजिह्वम्) जीभ के अगले भाग को (अवक्रन्देन) विकलतारहित व्यवहार से (उत्सादम्) जिसमें ऊपर को स्थिर होती है, उस (तालु) को (हनुभ्याम्) ठोढ़ी के पास के भागों से (वाजम्) अन्न को (आस्येन) जिससे भोजन आदि पदार्थ को गीला करते उस मुख से (अप:) जलों को (आण्डाभ्याम्) वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे आण्डों से (वृषणम्) वीर्य वर्षाने वाले अङ्ग को (श्मश्रुभिः) मुख के चारों ओर जो केश अर्थात् दाढ़ी उससे (आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को (भ्रूभ्याम्) नेत्र-गोलकों के ऊपर जो भौंहे हैं, उन से (पन्थानम्) मार्ग को (वर्लोभ्याम्) जाने-आने से (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि तथा (कनीनकाभ्याम्) तेज से भरे हुए काले नेत्रों के तारों के सदृश गोलों से (विद्युतम्) बिजुली को मैं समझाता हूँ। तुझ को (शुक्राय) वीर्य के लिये (स्वाहा) ब्रह्मचर्य क्रिया से और
(कृष्णाय) विद्या खींचने के लिये (स्वाहा) सुन्दरशीलयुक्त क्रिया से (पार्याणि) पूरे करने योग्य (पक्ष्माणि) जो सब ओर से लेने चाहिये, उन कामों वा पलकों के ऊपर के विन्ने वा (अवार्याः) नदी आदि के प्रथम ओर होने वाले (इक्षवः) गनों के पौंडे वा (अवार्याणि) नदी आदि के पहिले किनारे पर होने वाले पदार्थ (पक्ष्माणि) सब ओर से जिनका ग्रहण करें वा लोम और (पार्याः) पालना करने योग्य (इक्षवः) ऊख, जो
गुड़ आदि के निमित्त हैं, वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहियें।॥१॥
भावार्थ:-अध्यापक लोग अपने शिष्यों के अङ्गों को उपदेश से अच्छे प्रकार पुष्ट कर तथा आहार वा विहार का अच्छा बोध, समस्त विद्याओं की प्राप्ति, अखण्डित ब्रह्मचर्य का सेवन और ऐश्वर्य की प्राप्ति करा के सुखयुक्त करें।॥१॥"

अब यहाँ पर
"(आण्डाभ्याम्) वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे आण्डों से (वृषणम्) वीर्य वर्षाने वाले अङ्ग को (श्मश्रुभिः) मुख के चारों ओर जो केश अर्थात् दाढ़ी उससे (आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को।" का तात्पर्य है कि वीर्य धारण करने वाले अंडकोषों को वीर्य वर्षाने वाले अंग से और आदित्य नामक मुख्य विद्वानों को मुख की दाढ़ियों से समझाते हैं।



यहाँ पर  पानवाले ने "(आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को।" इतना पाठ मिटाकर और दो वाक्यों को गड्ड-मड्ड करके भ्रष्ट अर्थ निकाला है।


अब इसके बाद इन सबका संबंध किससे है, वो बताने हेतु वादी की लीला देखिये- " डाढ़ी उससे,,,,,,,,, /////वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहिए।"

अब यहाँ पर भाष्य के अंतिम वाक्य से उपरोक्त प्रकरण का संबंध जोड़ा है। जबकि वो वाक्य "समझाता हूँ" पर खत्म होता है। उसका भाव होगा कि वीर्य धारण करने वाले अंग-अंडकोषों से लिंग को और दाढ़ी से मुख्य विद्वानों को समझाता हूँ।

कुल मिलाकर हिंदी अनुवाद में भी कुछ दोष नहीं है। पानवाले ने केवल कांट-छाँट करके झूठा आरोप लगाया है। भाष्य के भावार्थ में भी दाढ़ी या मुख पर लिंग या अंडकोष से कोई संबंध नहीं है।

महर्षि दयानंद ने हिंदी अनुवाद नहीं किया,उस पर उनका दायित्व नहीं है। उसके आधार पर उन पर आक्षेप नहीं हो सकता,यह हम प्रथम भाग में लिख चुके हैं। अब संस्कृत पदार्थ देखिये-

"(वृषणम्) वर्षयितारम् (आण्डाभ्याम्) वीर्याधाराभ्याम् (आदित्यान्) मुख्यान् विदुषः (श्मश्रुभिः) मुखाऽभितः केशैः।"

यहाँ पर भी वीर्यधारण करने वाले अंडकोषों और दाढ़ीवाले विद्वानों का उल्लेख अलग-अलग है। इसलिये भाष्य की मूल संस्कृत और हिंदी अनुवाद निर्दोष हैं।

अब वादी पौराणिक पारंपरिक भाष्यों को न प्रस्तुत करते हुये लीपापोती करके लिखता है-


"अश्वमेध यज्ञ के अन्तर्गत वनस्पति याग एवं स्विष्टकृत् आहुतियों के क्रम में विशेष आहुतियाँ प्रदान कि जाती है, इस आहुति में प्राणियों के विभिन्न अंगों में स्थित शक्तियों को देव प्रयोजनों के लिए समर्पित किया जाता है, अश्वमेध यज्ञ राष्ट्र संगठन के अर्थ में प्रयुक्त है, यह आदर्श संगठनात्मक विद्या है, सुनिये इस श्रुति का अर्थ यह है कि--

दांतों की शक्ति से शाद देवता को, दंतमूल से अवका देवता को, दांतों के पश्च भाग से मृद देवता को, दाढ़ों से तेगदेवता को, जिह्वा के अग्र भाग से सरस्वती को, एवं जिह्वा से उत्साद देवता को प्रसन्न करते हैं, तालु की शक्ति से अवक्रन्द देवता को, ठोढी हे अन्न देवता को, मुख से जल देवता को प्रसन्न करते हैं, वृषणों से वृषण देवता को, दाढी से आदित्यों को, भौं से पन्थ देवता को, पलक लोमों से पृथ्वी एवं द्युलोक को, तथा आँख की पुतलियों से विद्युत् देवता को प्रसन्न करते हैं, शुक्ल एवं कृष्ण देव शक्तियों के निमित्त यह आहुति समर्पित है, नेत्रों के नीचे एवं ऊपर के लोमों से 'पार' एवं 'अवार' देवशक्तियों को प्रसन्न करते हैं।
"

जबकि यहाँ पर महीधर और उव्वट अश्वमेध यज्ञ में अश्व के अंगों की आहुति से देवताओं को तृप्त करना मानते हैं- 
 

महीधर- "स्विष्टकृद्वनस्पत्योरन्तरे वनस्पतियागानन्तरं स्विष्टकृद्यागात्पूर्वं शूले श्रपितं मांसं प्राजापत्योsश्व इति वचनात्प्रजापतये हुत्वा अमुष्मै स्वाहेति प्रतिदेवतं शादादित्वगन्तेभ्यो देवताश्वांगेभ्यो देवताभ्योsश्वांगेभ्योश्च घृतं जुहुयात्।" इत्यादि ।
( बाकी भाष्य चित्र में देखें)


भाव- यहाँ पर वनस्पति याग के बाद स्विष्टकृत् याग के पूर्व शूल से श्रपण किये हुये प्राजापत्य-अश्व के माँस की आहुति देने और विभिन्न देवताओं के लिये अश्वांगों की आहुति देने का उल्लेख है।


इसी आधार पर सनातन धर्मी 'धर्मसम्राट' पारंपरिक भाष्यकार 'करपात्री महाराज' लिखते हैं-


मन्त्रार्थ -इस अध्याय के प्रथम नौ मन्त्रों से विभिन्न देवताओं को पशुओं के अंग अर्पित  जाते हैं और
घृत की आहुति दी जाती है । मन्त्रों के अर्थ इस प्रकार है-दांतों से शाद नामक महाकाल को प्रसन्न करता हूँ।
दन्तमूलों से अवका नामक महाकाली को, दन्तपीठ से अपरा प्रकृति मिट्टी को, दाढ़ों से परा प्रकृति तैगा को, अथवा है
प्रजापते ! तुम्हारी वाणी को प्रसन्न करता हूँ। जिह्वाय से सरस्वती को, जिह्वा से प्रलयाग्नि के अधिष्ठाता उत्साद
देवता को, तालु से जल देवता अवक्रन्द को, हनुभाग से अन्नाधिष्ठात्री देवता को, मुख से जल देवता को, वृषणों से
कामना के दाता देवता को, मधु से आदिल्यों को, दोनों भौंहों से देवयान मार्ग की अधिष्ठात्री देवता को, पलकों से
चानापूधियो को, मेत्र हो पुनरियों से विद्युत् देवता को प्रसन्न करता हूँ। सत्त्वगुणमय विष्णुदेव के निमित्त और
तमोगुणमष रद्रदेव के निमित्त धेठ आहुति देता हूँ। नेवों के कार की पलकों के देवता पार है, नीचे की पलकों के
देवता जवार है ॥ १॥
( यजुर्वेद २५/१ पर करपात्री कृत भाष्य)

देखिये पाठकगण! पौराणिक भाष्य के अनुसार घोड़े के अंग काट-काटकर देवों के लिये आहूत किये जा रहे हैं। पौराणिकों के 'कामना वाले' देवता 'वृषणों यानी घोड़ों के आँड खाकर तृप्त होते हैं।  ऐसे नरपिशाच की तरह पशुओं के माँस से तृप्त होने वाले पैशाचिक पौराणिक देवताओं को दूर से नमस्कार!

जबकि इसके विरुद्ध मंत्र में ऐसा कोई शब्द नहीं है जिससे यह बूचड़खाना खोला जा सके।

दयानंद यजुर्वेद भाष्य मंडन-२| (दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य मंडनम्- भाष्य-२) - कार्तिक अय्यर दिनांक- ३/०९/२०२० ।।ओ३म्।। नमस्ते पाठकों! [पाठकों!लगभग पाँच सालों पहले कुंदन कुमार उर्फ उपेंद्र कुमार 'बागी' ने चु....र्थप्रकाश यानी 'सत्यानाश प्रकाश' नामक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक में महर्षि दयानंद के यजुर्वेद भाष्य, उनके जीवनचरित्र और सत्यार्थप्रकाश पर असफल और पुरानी घिसी पिटी पौराणिक लेखकों की किताबों के अनुसार खंडन करने का कुप्रयास किया गया। २०१५ के समय में श्री नटराजजी, श्री विपुल जी, श्री सुशील जी , श्री रजनीश जी और हमने पौराणिकों के आक्षेपों के उत्तर दिये। इनके खंडन में 'प्यारा ऋषि' और 'पौराणिक गप्प खंडन' नामक ब्लॉग भी बनाये। इन लोगों के मुखिया कुंदन पानवाले ने 'आर्यमंतव्य' की देखादेखी 'हिंदूमंतव्य ' ब्लॉग बनाया और अपने पौराणिक लेखकों की किताबों के आधार पर और गालीगलौच जोड़कर लेख लिखे। उसी ब्लॉग की सामग्री उपरोक्त किताब में है। उस ब्लॉग का प्रयोग मुसलमान कर सकते हैं, और करते भी हैं- यह बताने पर और हमारे अपने ब्लॉग मिटाने पर भी पौराणिक पीछे नहीं हटे और हिंदूमंतव्य को चलाये रखा। परंतु अब फेसबुक पर पौराणिकों का महर्षि दयानंद के विरुद्ध विषवमन अति हो गया है। अब हम कम-से-कम यजुर्वेद भाष्य पर किये आक्षेपों का खंडन जरूर करेंगे। इसलिये एक-एक कर लेख पढ़ें।] हमने प्रथम भाग में यजुर्वेद २५/७ भाष्य पर चर्चा की थी। उसका कोई संतोषजनक लेखबद्ध उत्तर पौराणिक पोपमंडल की ओर से नहीं आया। अब इसी श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं। प्रश्न-२- शादं दद्भिर् अवकां दन्तमूलैर् मृदं बर्स्वैस् तेगान्दम्ंष्ट्राभ्याम्ं सरस्वत्या ऽ अग्रजिह्वं जिह्वाया ऽ उत्सादम् अवक्रन्देन तालु वाजम्ँहनुभ्याम् अप ऽ आस्येन वृषणम् आण्डाभ्याम् आदित्याम्ँ श्मश्रुभिः पन्थानं भ्रूभ्यां द्यावापृथिवी वर्तोभ्यां विद्युतं कनीनकाभ्याम्ं शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्य् अवार्या ऽ इक्षवो वार्याणि पक्ष्माणि पार्या ऽ इक्षवः॥ ~यजुर्वेद {अध्याय २५, मंत्र १} दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि--- "हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए ज्ञानी जन! ,,,,,,,,,//////(आण्डाभ्याम्)- वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करनेहारे आण्डों से, (वृषणम्)- वीर्य वर्षानेवाली अंग {लिंग} को, (श्मश्रुभि:)- मुख के चारों ओर जो केश, अर्थात डाढ़ी उससे,,,,,,,,, /////वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहिए उत्तर- पाठकों! पौराणिक धूर्तशिरोमणि कुंदर कुमार पानवाले ने यहाँ जानबूझकर आधा-अधूरा भाष्य देकर महर्षि दयानंद पर आक्षेप किया है। इनके दिये अर्थ के अनुसार 'वीर्य वर्षाने वाले अंग,यानी आंडों और लिंग को मुख के चारों ओर लेना है।' यहाँ पर प्रथम तो हम पंडितों द्वारा बनाया महर्षि दयानंद का भाष्य देते हैं- "पदार्थ:-हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए विद्यार्थी जन ! (ते) तेरे (दद्धिः) दांतों से (शादम्) जिस में छेदन करता है, उस व्यवहार को (दन्तमूलैः) दांतों की जड़ों और (बस्र्वैः) दांतों की पछाड़ियों से (अवकाम्) रक्षा करने वाली (मृदम्) मट्टी को (दंष्ट्राभ्याम्) डाढ़ों से (सरस्वत्यै) विशेष ज्ञान वाली वाणी के लिये (गाम्) वाणी को (जिह्वायाः) जीभ से (अग्रजिह्वम्) जीभ के अगले भाग को (अवक्रन्देन) विकलतारहित व्यवहार से (उत्सादम्) जिसमें ऊपर को स्थिर होती है, उस (तालु) को (हनुभ्याम्) ठोढ़ी के पास के भागों से (वाजम्) अन्न को (आस्येन) जिससे भोजन आदि पदार्थ को गीला करते उस मुख से (अप:) जलों को (आण्डाभ्याम्) वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे आण्डों से (वृषणम्) वीर्य वर्षाने वाले अङ्ग को (श्मश्रुभिः) मुख के चारों ओर जो केश अर्थात् दाढ़ी उससे (आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को (भ्रूभ्याम्) नेत्र-गोलकों के ऊपर जो भौंहे हैं, उन से (पन्थानम्) मार्ग को (वर्लोभ्याम्) जाने-आने से (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि तथा (कनीनकाभ्याम्) तेज से भरे हुए काले नेत्रों के तारों के सदृश गोलों से (विद्युतम्) बिजुली को मैं समझाता हूँ। तुझ को (शुक्राय) वीर्य के लिये (स्वाहा) ब्रह्मचर्य क्रिया से और (कृष्णाय) विद्या खींचने के लिये (स्वाहा) सुन्दरशीलयुक्त क्रिया से (पार्याणि) पूरे करने योग्य (पक्ष्माणि) जो सब ओर से लेने चाहिये, उन कामों वा पलकों के ऊपर के विन्ने वा (अवार्याः) नदी आदि के प्रथम ओर होने वाले (इक्षवः) गनों के पौंडे वा (अवार्याणि) नदी आदि के पहिले किनारे पर होने वाले पदार्थ (पक्ष्माणि) सब ओर से जिनका ग्रहण करें वा लोम और (पार्याः) पालना करने योग्य (इक्षवः) ऊख, जो गुड़ आदि के निमित्त हैं, वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहियें।॥१॥ भावार्थ:-अध्यापक लोग अपने शिष्यों के अङ्गों को उपदेश से अच्छे प्रकार पुष्ट कर तथा आहार वा विहार का अच्छा बोध, समस्त विद्याओं की प्राप्ति, अखण्डित ब्रह्मचर्य का सेवन और ऐश्वर्य की प्राप्ति करा के सुखयुक्त करें।॥१॥" अब यहाँ पर "(आण्डाभ्याम्) वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे आण्डों से (वृषणम्) वीर्य वर्षाने वाले अङ्ग को (श्मश्रुभिः) मुख के चारों ओर जो केश अर्थात् दाढ़ी उससे (आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को।" का तात्पर्य है कि वीर्य धारण करने वाले अंडकोषों को वीर्य वर्षाने वाले अंग से और आदित्य नामक मुख्य विद्वानों को मुख की दाढ़ियों से समझाते हैं। यहाँ पर पानवाले ने "(आदित्यान्) मुख्य विद्वानों को।" इतना पाठ मिटाकर और दो वाक्यों को गड्ड-मड्ड करके भ्रष्ट अर्थ निकाला है। अब इसके बाद इन सबका संबंध किससे है, वो बताने हेतु वादी की लीला देखिये- " डाढ़ी उससे,,,,,,,,, /////वे पदार्थ अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहिए।" अब यहाँ पर भाष्य के अंतिम वाक्य से उपरोक्त प्रकरण का संबंध जोड़ा है। जबकि वो वाक्य "समझाता हूँ" पर खत्म होता है। उसका भाव होगा कि वीर्य धारण करने वाले अंग-अंडकोषों से लिंग को और दाढ़ी से मुख्य विद्वानों को समझाता हूँ। कुल मिलाकर हिंदी अनुवाद में भी कुछ दोष नहीं है। पानवाले ने केवल कांट-छाँट करके झूठा आरोप लगाया है। भाष्य के भावार्थ में भी दाढ़ी या मुख पर लिंग या अंडकोष से कोई संबंध नहीं है। महर्षि दयानंद ने हिंदी अनुवाद नहीं किया,उस पर उनका दायित्व नहीं है। उसके आधार पर उन पर आक्षेप नहीं हो सकता,यह हम प्रथम भाग में लिख चुके हैं। अब संस्कृत पदार्थ देखिये- "(वृषणम्) वर्षयितारम् (आण्डाभ्याम्) वीर्याधाराभ्याम् (आदित्यान्) मुख्यान् विदुषः (श्मश्रुभिः) मुखाऽभितः केशैः।" यहाँ पर भी वीर्यधारण करने वाले अंडकोषों और दाढ़ीवाले विद्वानों का उल्लेख अलग-अलग है। इसलिये भाष्य की मूल संस्कृत और हिंदी अनुवाद निर्दोष हैं। अब वादी पौराणिक पारंपरिक भाष्यों को न प्रस्तुत करते हुये लीपापोती करके लिखता है- "अश्वमेध यज्ञ के अन्तर्गत वनस्पति याग एवं स्विष्टकृत् आहुतियों के क्रम में विशेष आहुतियाँ प्रदान कि जाती है, इस आहुति में प्राणियों के विभिन्न अंगों में स्थित शक्तियों को देव प्रयोजनों के लिए समर्पित किया जाता है, अश्वमेध यज्ञ राष्ट्र संगठन के अर्थ में प्रयुक्त है, यह आदर्श संगठनात्मक विद्या है, सुनिये इस श्रुति का अर्थ यह है कि-- दांतों की शक्ति से शाद देवता को, दंतमूल से अवका देवता को, दांतों के पश्च भाग से मृद देवता को, दाढ़ों से तेगदेवता को, जिह्वा के अग्र भाग से सरस्वती को, एवं जिह्वा से उत्साद देवता को प्रसन्न करते हैं, तालु की शक्ति से अवक्रन्द देवता को, ठोढी हे अन्न देवता को, मुख से जल देवता को प्रसन्न करते हैं, वृषणों से वृषण देवता को, दाढी से आदित्यों को, भौं से पन्थ देवता को, पलक लोमों से पृथ्वी एवं द्युलोक को, तथा आँख की पुतलियों से विद्युत् देवता को प्रसन्न करते हैं, शुक्ल एवं कृष्ण देव शक्तियों के निमित्त यह आहुति समर्पित है, नेत्रों के नीचे एवं ऊपर के लोमों से 'पार' एवं 'अवार' देवशक्तियों को प्रसन्न करते हैं। " जबकि यहाँ पर महीधर और उव्वट अश्वमेध यज्ञ में अश्व के अंगों की आहुति से देवताओं को तृप्त करना मानते हैं- महीधर- "स्विष्टकृद्वनस्पत्योरन्तरे वनस्पतियागानन्तरं स्विष्टकृद्यागात्पूर्वं शूले श्रपितं मांसं प्राजापत्योsश्व इति वचनात्प्रजापतये हुत्वा अमुष्मै स्वाहेति प्रतिदेवतं शादादित्वगन्तेभ्यो देवताश्वांगेभ्यो देवताभ्योsश्वांगेभ्योश्च घृतं जुहुयात्।" इत्यादि । ( बाकी भाष्य चित्र में देखें) भाव- यहाँ पर वनस्पति याग के बाद स्विष्टकृत् याग के पूर्व शूल से श्रपण किये हुये प्राजापत्य-अश्व के माँस की आहुति देने और विभिन्न देवताओं के लिये अश्वांगों की आहुति देने का उल्लेख है। इसी आधार पर सनातन धर्मी 'धर्मसम्राट' पारंपरिक भाष्यकार 'करपात्री महाराज' लिखते हैं- मन्त्रार्थ -इस अध्याय के प्रथम नौ मन्त्रों से विभिन्न देवताओं को पशुओं के अंग अर्पित जाते हैं और घृत की आहुति दी जाती है । मन्त्रों के अर्थ इस प्रकार है-दांतों से शाद नामक महाकाल को प्रसन्न करता हूँ। दन्तमूलों से अवका नामक महाकाली को, दन्तपीठ से अपरा प्रकृति मिट्टी को, दाढ़ों से परा प्रकृति तैगा को, अथवा है प्रजापते ! तुम्हारी वाणी को प्रसन्न करता हूँ। जिह्वाय से सरस्वती को, जिह्वा से प्रलयाग्नि के अधिष्ठाता उत्साद देवता को, तालु से जल देवता अवक्रन्द को, हनुभाग से अन्नाधिष्ठात्री देवता को, मुख से जल देवता को, वृषणों से कामना के दाता देवता को, मधु से आदिल्यों को, दोनों भौंहों से देवयान मार्ग की अधिष्ठात्री देवता को, पलकों से चानापूधियो को, मेत्र हो पुनरियों से विद्युत् देवता को प्रसन्न करता हूँ। सत्त्वगुणमय विष्णुदेव के निमित्त और तमोगुणमष रद्रदेव के निमित्त धेठ आहुति देता हूँ। नेवों के कार की पलकों के देवता पार है, नीचे की पलकों के देवता जवार है ॥ १॥ ( यजुर्वेद २५/१ पर करपात्री कृत भाष्य) देखिये पाठकगण! पौराणिक भाष्य के अनुसार घोड़े के अंग काट-काटकर देवों के लिये आहूत किये जा रहे हैं। पौराणिकों के 'कामना वाले' देवता 'वृषणों यानी घोड़ों के आँड खाकर तृप्त होते हैं। ऐसे नरपिशाच की तरह पशुओं के माँस से तृप्त होने वाले पैशाचिक पौराणिक देवताओं को दूर से नमस्कार! जबकि इसके विरुद्ध मंत्र में ऐसा कोई शब्द नहीं है जिससे यह बूचड़खाना खोला जा सके।

क्या वैदिक धर्म में पशुबलि है?

क्या वैदिक धर्म में पशुबलि है?
- कार्तिक अय्यर
(३०/८/१८)
।।ओ३म्।।
हमने फेसबुक पर एक मुस्लिम महोदय की पोस्ट देखी जिसमें वेद पर पशुबलि व मांसाहार के आक्षेप किये। इस लेख में इनकी समीक्षा करते हैं-
"जो लोग इस्लाम मे जानवरोँ की कुर्बानी की आलोचना करते हैं हमे अपनी वेदों को भी पढ लेना चाहिए" :-
प्रश्न-१- वेदों मे मनुष्य बलि का जिक्र :-
देवा यदयज्ञ------------पुरूषं पशुम।।
यजुर्वेद ( 31 / 15)
अर्थात : = देवताओं ने पुरूषमेध किया और पुरूष नामक पशु वध का किया ।
उत्तर:- कृपया बतायें कि इस मंत्र में किस शब्द का अर्थ है कि-"पुरुष रूप पशु का वध कर दिया"? यहां पर "वध" करने का अर्थ तो कोई भी शब्द नहीं देता। यहां पशु शब्द का अर्थ "सबको देखने वाला, सर्वद्रष्टा परमात्मा" है। शब्दकोशों में देखें-
कल्पद्रुम कोश-
पशुः, पुं, (अविशेषेण सर्व्वं पश्यतीति)
वाचस्पत्यम् कोश-
पशु¦ पु॰ सर्वमविशेषेण पश्यति दृश--कु पशादेशः।
आप्टे कोश-
The soul, the Supreme Spirit.
और "बध्नन्" शब्द का अर्थ बांधने के लिये होता है, वध करने या मारने काटने में नहीं। "अबध्नन्" का अर्थ कोई भी भाष्यकार मारने-काटने के संदर्भ में नहीं करता, न ही किसी व्याकरण से इसका मारने-काटने के विषय में अर्थ कर सकता है। हम पूरा मंत्र व उस पर महर्षि दयानंद का भाष्य देते हैं। (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से)-
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽअबध्नन् पुरुषं पशुम्॥15॥
( यजुर्वेद अध्याय ३० मंत्र १५)
(सप्तास्या॰) ईश्वर ने एक एक लोक के चारों ओर सात सात परिधि ऊपर ऊपर रची हैं। जो गोल चीज के चारों ओर एक सूत के नाप के जितना परिमाण होता है, उस को परिधि कहते हैं। सो जितने ब्रह्माण्ड में लोक हैं, ईश्वर ने उन एक एक के ऊपर सात सात आवरण बनाये। एक समुद्र, दूसरा त्रसरेणु, तीसरा मेघमण्डल का वायु, चौथा वृष्टिजल और पांचमा वृष्टिजल के ऊपर एक प्रकार का वायु, छठा अत्यन्त सूक्ष्म वायु जिस को धनञ्जय कहते हैं, सातमा सूत्रात्मा वायु जो कि धनञ्जय से भी सूक्ष्म है, ये सात परिधि कहाते हैं। (त्रिः सप्त समिधः॰) और इस ब्रह्माण्ड की सामग्री 21 इक्कीस प्रकार की कहाती है। जिस में से एक प्रकृति, बुद्धि और जीव ये तीनों मिलके हैं क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ है, दूसरा श्रोत्र, तीसरी त्वचा, चौथा नेत्र, पांचमी जिह्वा, छठी नासिका, सातमी वाक्, आठमा पग, नवमा हाथ, दशमी गुदा, ग्यारहमा उपस्थ, जिस को लिङ्ग इन्द्रिय कहते हैं, बारहमा शब्द, तेरहमा स्पर्श, चौदहमा रूप, पन्द्रहमा रस, सोलहमा गन्ध, सत्रहमी पृथिवी, अठारहमा जल, उन्नीसमा अग्नि, बीसमा वायु, इक्कीसमा आकाश, ये इक्कीस समिधा कहाते हैं। (देवा य॰) जो परमेश्वर पुरुष इस सब जगत् का रचने वाला, सब का देखने वाला और पूज्य है, उस को विद्वान् लोग सुन के और उसी के उपदेश से उसी के कर्म और गुणों का कथन, प्रकाश और ध्यान करते हैं। उस को छोड़ के दूसरे को ईश्वर किसी ने नहीं माना और उसी के ध्यान में अपने आत्माओं को दृढ़ बांधने से कल्याण जानते हैं॥15॥

महीधर,सायण व पं श्रीराम का अर्थ भी देखिये-
"देवाः प्रजापतिप्राणेंद्रियवृषाः यज्ञं तन्वानाः मानसं यज्ञं कुर्वाणाः पुरुषं पशुबमबध्नन् विराट्पुरुषमेव पशुत्वेन भावितवन्नः।।"( ३०/१५ यजुर्वेद महीधर भाष्य)
बिलकुल ऐसा ही अर्थ सायणाचार्य जी इस मंत्र का करते है। यह पुरुष सूक्त पर सायणभाष्य आपको anadashram Sanskrit series की वेबसाइट पर देख सकते हैं।
इसका अर्थ पौराणिक वेदभाष्यकार पं श्रीराम शर्मा के शब्दों में देखिये-
"जब देवताओं ने मानसयज्ञ को विस्तृत करते हुये इस विराट पुरुष में पशु रूप की भावना करके बांधा...." ( ३०/१५ पर पं श्रीराम शर्मा कृत भाष्य)
यहां पर सायण, महीधर व पं श्रीराम तीनों "मानस यज्ञ में पुरुष(यानी ब्रह्मांडरूपी पुर में वास करने वाले ईश्वर को) पशु (सबकुछ प्रत्यक्ष करने वाला,सर्वदर्शक, सर्वद्रष्टा) के रूप में अपने मन में बांधकर ध्यान किया। इस मंत्र में कहीं भी पुरुष बलि की बात ही नहीं है।
देखिये, यजुर्वेद के व्याख्यान शतपथब्राह्मण में लिखा है कि पुरुष मेध यज्ञ में पुरुष को केवल अग्नि के पास लाकर जीवित छोड़ दिया जाता था। यह विधि शतपथकार ने अपने काल में बढ़ी वेदविरोधी कृत्यों के परिष्कार में कही थी-
अथ हैनं वागभ्युवाद पुरुष मा सन्तिष्ठिपो यदि संस्थापयिष्यसि पुरुष एव पुरुषमत्स्यतीति तान्पर्यग्निकृतानेवोदसृजत्तद्देवत्या आहुतीरजुहोत्ताभिस्ता देवता अप्रीणात्ता एनं प्रीता अप्रीणन्त्सर्वैः कामैः - (१३.६.२.[१३] शतपथब्राह्मण )
अस्तु। नृयज्ञ या पुरुषयज्ञ का अर्थ सब मनुष्यों को परस्पर एक-दूसरे मनुष्यों का आदर करना और मरने पर शवदाह करना ऐसे संदर्भों में प्रयोग होता है। मध्यकाल में पुरुषमेध में नरबलि होने लगी। यह वेदविरोधी परंपरा है।
प्रश्न-२ पुरूष बलि का जिक्र शतपथ ब्राह्मण ( 1/2/1/6) और ऐतरेय ब्राह्मण ( 2/8) मे भी है ।
उत्तर- हम ऊपर लिख चुके हैं कि शतपथब्राह्मण खुद पुरुषबलि का खंडन करता है। अतः शतपथ का नाम लेकर कुछ भी संदर्भ लिखने से झूठ सही नहीं हो जायेगा। हम शतपथ के इस संदर्भ का उद्धरण दर्ज करते हैं-
(क)-
तं मध्यमेन कपालेनाभ्युपदधाति । देवा ह वै यज्ञं तन्वानास्तेऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद्बिभयांचक्रुर्नेन्नोऽधस्तान्नाष्ट्रारक्षांस्युपोत्तिष्ठानित्यग्निर्हि रक्षसामपहन्ता तस्मादेवमुपदधाति तद्यदेष एव भवति नान्य एष हि यजुष्कृतो मेध्यस्तस्मान्मध्यमेन कपालेनाभ्युपदधाति - १.२.१.[६]
जरा बताइये, आपको यहां कौन से शब्दों में नरबलि दिख रही है? हमने इसके हिंदी अनुवाद का चित्र दिया हुआ है। यहां पर प्रकरण यह है कि-
" उस अंगारे के बीच में कपाल=एक तरह का यज्ञपात्र रखता है। यजमान कपाल को अंगारे पर रखता है, जो यजुष्कृत यानी यजुर्वेद के मंत्रों से बताया जाता है इत्यादि।"
यहां पर कहीं भी पशुवध या नरबलि नहीं लिखी। कुछ भी संदर्भ लिखकर झूठ बोलने वाले को परमात्मा की लाख-लाख धिक्कार!!
(ख)- ऐतरेय ब्राह्मण- पंचिका २ खंड ८ - हां, अब ऐतरेय की भी पुष्टि करलें। ऐतरेय ब्राह्मण का पाठ हम पंचिका २ खंड ८,९ दोनों का भावार्थ संक्षेप में बताते हैं-

पुरुषं वै देवाः पशुमालभन्त तस्मादालब्धान्मेध उदक्रामत्सोऽश्वम्प्राविशत्त-स्मादश्वो मेध्योऽभवदथैनमुत्क्रान्तमेधमत्यार्जन्त स..... ॥2.8।।
स वा एष पशुरेवालभ्यते यत्पुरोळाशस्तस्य यानि किंशारूणि तानि रोमाणि ये तुषाः सा त्वग् ये फलीकरणास्तदसृग्यत्पिष्टं किक्नसास्तन्मांसं यत्किं चित्कंसारं तदस्थि सर्वेषां वा एष पशूनाम्मेधेन यजते यः पुरोळाशेन यजते तस्मादाहुः ..॥2.9॥
हम इन दोनों कंडिकाओं पर डॉ सुधाकर मालवीय जी, जिन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण पर सायणाचार्य के संस्कृत का हिंदी अनुवाद किया है, का अर्थ संक्षेप में देते हैं।
पाठकगण, इन दोनों कंडिकाओं में कहीं भी मांस भक्षण या पशुबलि की आज्ञा नहीं है। इनका भाव है-
" प्राचीनकाल में देवों ने पुरुष का आलंभन किया ( वध नहीं, आलंभन का अर्थ स्पर्श,प्राप्ति भी है)। मगर उसमें से यज्ञ हेतु हविर्भाग निकल कर अश्व में आ गया। अश्व से,गौ फिर अवि(,भेड़)फिर अज में आ गयी। इस तरह से ये सब मेधहीन हो गये, 'इसलिये इन पशुओं का मांस नहीं खाना चाहिए। फिर यह मेध्यभाग पृथ्वी में प्रवेश कर गया, फिर यह व्रीहि यानी धान्य हो गया। अतः पुरोडाश को ही यज्ञ हेतु इष्ट किया। ( पुरोडाश धान्य से बनने वाली एक रोटी-जैसा पदार्थ है)। फिर पुरोडाश व पशु की संगति लगाते हैं कि व्रीहि का भूसा पशु के लोम, भूंसी त्वचा, फलीकरण रुधिर पिसा हुआ अवयव मांस स्थानीय है। और कठोर भाग अस्थि है। जो इस तरह के व्रीहि रूप पुरोडाश का यजन करता है, उसका अनुष्ठान सफल है, क्योंकि यह सारे पशुओं का सार है।"
यहां पुरोडाश का अलंकार बनाया गया है- " पुरोडाशाँ अलंकुरु" ( पेज २४१) अतः सारी आख्यायिका एक तरह का अलंकारिक वर्णन है। इसका सार यह है कि किसी भी पशु का मांस न खाना चाहिए, क्योंकि उनका मांस मेधहीन यानी सारहीन है, उसमें पवित्रता नहीं है। पशु का शरीर खुद धान्य से पोषित होता है, अतः धान्यों का पुरोडाश बनाकर ही याज्ञिक लोगों को अनुष्ठान करना चाहिए।
उत्क्रान्तमेधा अमेध्याः पशवस्तस्मादेतेषां नाश्नीयात्तम- इस वचन का अर्थ है कि सब पशु अमेध्य है, अतः इनका मांस नहीं खाना चाहिए।

उत्क्रान्तमेधा अमेध्याः पशवस्तस्मादेतेषां नाश्नीयात्तम- इस वचन का अर्थ है कि सब पशु अमेध्य है, अतः इनका मांस नहीं खाना चाहिए।
पूरा ऐतरेय ब्राह्मण का संस्कृत पाठ व हिंदी अनुवाद इस लिंक में पेज २३६ से २४१ तक देखें, और मुल्ला जी के कमीनेपन का अंदाजा लहाइये-

https://archive.org/stream/in.ernet.dli.2015.407784/2015.407784.The-Aitareya#page/n302

प्रश्न-३-
हिंदू धर्म ग्रंथो मे एक भी धर्म ग्रंथ ऐसा नही है जहां जीव हत्या और कुर्बानी का जिक्र मौजूद ना हो पढो :-
वेद , महाभारत , मनुस्मृति, रामायण मे मांस भक्षण और जीव हत्या :-
1 जो मांस नहीं खाएगा वह 21 बार पशु योनी में पैदा होगा-मनुस्मृति (5/35)
2 यजुर्वेद (30/15) मे घोडे की बलि कुर्बानी की जाती थी ।
उत्तर- हां हां, मांसभक्षण किस तरह से है, ऊपर हम आपके झूठे प्रमाण देखकर जान चुके हैं। वेद से लेकर रामायण, महाभारत तक में मांसभक्षण का सर्वत्र निषेध है। महाभारत में खुद कहा है मांसभक्षण राक्षसों ने मिलावट किया है, वेद में इसका वर्णन नहीं है।
सुरा मत्स्याः पशोर्मांसं द्विजातीनां बलिस्तथा।
धूर्तैः प्रवर्तितं यज्ञे नैतद् वेदेषु कथ्यते।। (महाभारत, शांतिपर्व)
मद्य, मछली और पशुओं का मांस तथा यज्ञ में द्विजाति आदि मनुष्यों का बलिदान धूर्तों द्वारा यज्ञ में प्रवर्तित हुआ है - अर्थात दुष्ट राक्षस मांसाहारियों ने यज्ञ में चलाया है। वेदों में मांस का विधान नहीं है।
महाभारत में अनेक जगह मांसाहार का खंडन है, इस पोस्ट को देखिये-

(https://m.facebook.com/permalink.php?story_fbid=1197760380246312&id=977704915585194)

प्रथम आपने मनुस्मृति ५/५३ में श्राद्ध में पशुमांस न खाने वाले को नरक मिलने का प्रमाण लिखा है। दरअसल महर्षि मनु जीवित पितरों यानी माता,पिता, गुरुजन आदि को सत्कार करना श्राद्ध मानते थे। इसके लिये डॉ सुरेंद्रकुमार आर्य जी कृत मनुस्मृति का भाष्य देखें। मनुस्मृति में खुद मांसभक्षण का निषेध अनेक जगह है। कुछ प्रमाण हम आगे भी देंगे। अतः यह श्लोक मनुस्मृति के विरुद्ध होने से प्रक्षेप है।
यहां तक कि महाभारत मनु का वचन उद्धृत करके मांसभक्षण निषेध करता है-
*न भक्षयति यो मांसं न च हन्त्यान्न घातयेत् ।*
*तन्मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।।*
―(२१/१२)
*अर्थात्–*स्वायम्भुव मनु का कथन है―"जो मनुष्य न मांस खाता है, न पशु-हिंसा करता और न दूसरे से ही हिंसा कराता है, वह सभी प्राणियों का मित्र होता है।"
*अधृष्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ।*
*साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मांसं विवर्जयन् ।।*
―(२१/१३)
*अर्थ―*जो मनुष्य मांस का परित्याग कर देता है, वह सब प्राणियों में आदरणीय, सब जीवों का विश्वसनीय और सदा साधुओं से सम्मानित होता है।
( महाभारत अनुशासन पर्व)
दूसरा जो आपने यजुर्वेद ३०/१५ में अश्व की बलि देना लिखा है, वह भी शत प्रतिशत झूठ है।
मंत्र का विषय है- राजेश्वरौ देवता- यानी राजा व ईश्वर इसका प्रतिपाद्य विषय है। इसका अर्थ महर्षि दयानंद कृत इस लिंक में देखें-

http://www.onlineved.com/yajur-ved/?mantra=15&adhyay=30

हम पूरा मंत्र देते हैं-

http://www.onlineved.com/yajur-ved/?mantra=15&adhyay=30

हम पूरा मंत्र देते हैं-
30.15
यमाय यमसूम् अथर्वभ्यो ऽवतोकाम्̐ संवत्सराय पर्यायिणीं परिवत्सरायाविजाताम् इदावत्सरायातीत्वरीम् इद्वत्सरायातिष्कद्वरीं वत्सराय विजर्जराम्̐ संवत्सराय पलिक्नीम् ऋभुभ्यो ऽजिनसंधम्̐ साध्येभ्यश् चर्मम्नम् ॥
( यजुर्वेद ३०/१५)

जरा बताइये, कौन से शब्दों का अर्थ यहां पर अश्व की बलि से है?
इसका पं श्रीराम शर्मा ( पौराणिक भाष्यकार) कृत अर्थ हमने चित्र में दिया है। वहां भी ऐसा कुछ नहीं है,यथा-
" जुड़वा प्रसव वाली को यम के लिये,पुत्रहीना को अथर्व के लिये,पर्याविणी को संवत्सर के लिये, वंध्या को परिवत्सप के लिये.... नियुक्त करें।"( यजुर्वेद ३०/१५ पं श्रीराम शर्मा कृत अर्थ)
यहां पूरे मंत्र में कोई पशुबलि नहीं है। झूठा प्रमाण देकर इस्लाम का "तकिय्या" खूब निभा रहो मियां, पर हमारे सामने दाल न गलेगी।
प्रश्न-४-
3 महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 88 मे सुअर की कुर्बानी करनी चाहिए ।
उत्तर:- पाठकों! हम महाभारत से प्रमाण देकर बता चुके हैं मांसभक्षण आदि पाप राक्षसों ने जोड़े हैं, यह वैदिक धर्म में नहीं है। इसके विरुद्ध महाभारत में मांसाहार आदि के विधायक वचन वेदविरुद्ध व प्रक्षेप ही हैं। क्योंकि महाभारत व्यास ने २४००० श्लोकों में बनाया था, पर आज हर संस्करण में भारी मिलावट मिलती है। इसलिये १०० महाभारत शुद्ध नहीं है। इस अनुशासन पर्व अ.८८ में गीताप्रेस का अनुवाद हमने देखा। वहां कोई मांसाहार नहीं है। हम संक्षेप में नीचे लिखते हैं-
"सुनो। नरेश्‍वर! तिल, ब्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूल के द्वारा श्राद्ध करने से पितरों को एक मास तक तृप्ति बनी रहती है।
मनु जी का कथन है कि जिस श्राद्ध में तिल की मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य पदार्थों में तिलों का प्रधान रूप से उपयोग बताया गया है। यदि श्राद्ध में गाय का दही दान किया जाये तो उससे पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति होती बतायी गयी है। गाय के दही का जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृत मिश्रित खीर का भी समझना चाहिये।
पितर कहते हैं- 'क्या हमारे कुल में कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायन में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मघा और त्रियोदशी तिथि का योग होने पर हमारे लिये घृत मिश्रित खीर का दान करेगा? अथवा वह नियमपूर्वक व्रत का पालन करके मघा नक्षत्र में ही हाथी के शरीर की छाया में बैठकर उसके कानरूपी व्यजन से हवा लेता हुआ अन्न-विशेष चावल का बना हुआ पायश लौहशाक से विधिपूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा?
पितरों की क्षय-तिथि को जल, मूल, फल उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधु मिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्त काल तक तृप्ति देने वाला है।'"
महाभारत पढ़ने हेतु यह लिंक देखें। आप इससे गीताप्रेस का अनूदित पूरा महाभारत पढ़ सकते हैं-

http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_88_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_1-10

वैसे मृतक श्राद्ध वेदविरुद्ध और खुद महाभारत के विरुद्ध है, फिर भी श्राद्ध में मांसाहार का पढें-
खुद भागवतपुराण में ही है-
प्रश्न-५- रामायण मे राम और दशरथ द्वारा हिरण का शिकार और मांस भक्षण देखे :-( वाल्मिकी रामायण अयोध्या कांड (52/89) गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन )
उत्तर- आपने वाल्मीकीय रामायण , गीताप्रेस का अनुवाद पढ़कर आक्षेप किया है, या फिर ऐसे आक्षेप कर दिया। पाठकों, हम गीताप्रेस के उक्त पते का पूरा विवरण देते हैं।
अयोध्याकांड सर्ग ५२ श्लोक ८८-९० का प्रमाण दिया है, उसका अवलोकन करें:-
गवां शतशहस्रं च वस्त्राण्यन्नं च पेशलम् ।
ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तव प्रियचिकीर्षया ॥ ८८ ॥
' आपका प्रिय करने की इच्छसे मैं ब्राह्मणों को एक लाख गायें,बहुत से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूंगी॥८८॥
सुराघटसहस्रेण मांसभूतौदनेन च ।
यक्ष्ये त्वां प्रियतां देवि पुरीं पुनरुपागता ॥ ८९ ॥
’देवी ! पुनः अयोध्यापुरमें वापस लौट आने पर मैं हजारो देवदुर्लभ पदार्थों से और राजकीय भागरहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्नके द्वारा आपकी पूजा करूंगी।आप मुझ पर प्रसन्न होवें** ॥८९॥
** इस श्लोक में आये ’सुराघटसहस्त्रेण’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार हैे- सुरेषु देवेषु न घटंते न संतीत्यर्थः; तेषां सहस्त्रं तेन सहत्रसंख्याक सुरदुर्लभ पदार्थे नेत्यर्थः। ’मांसभूतौदनेन’ की व्युत्पत्ति इस प्रकार समझनी चाहिये - मांसभूतौदनेन मा नास्ति अंसो राजभागो यस्या सा एव भूः पृथ्वी च उतं वस्त्रं च ओदनंच एतेषां समाहारः, तेन च त्वां यक्ष्ये ।
यह अर्थ और पादटिप्पणी गीताप्रेस की टीका के अनुसार लिखी है। यहां पर कोई मांसाहार की बात नहीं है, और हो भी नहीं सकती क्योंकि यहां ब्राह्मणों को गोदान की बात है।
प्रश्न-६- 3 ऋषि वामदेव ने कुत्ते का मांस खाया (मनुस्मृति 10/106)
उत्तर- पाठकों! मनुस्मृति में मांस का निषेध है, पर परवर्ती वाममार्गी और धूर्तजनों ने इसमें मांसाहार,सुरापान आदि के प्रक्षेप जोड़ दिये। यह श्लोक भी ऐसा ही है। देखिये-
श्वमांसं इच्छनार्तोऽत्तुं धर्माधर्मविचक्षणः ।
प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान् ।।10/106।।
धर्म और अधर्म के ज्ञाता वामदेव ऋषि क्षुधा से पीड़ित होकर आत्मरक्षार्थ कुत्ते का माँस खाने की इच्छा करने पर भी पाप से लिप्त नहीं हुए।
यहां पता चला कि वामदेव ने आपात्काल में मांस खाया, और उनको पाप न लगा। सनातन धर्म में भी आपात्काल में मांसाहार करना गलत नहीं माना जाता। मगर आमतौर पर मांसाहार मना है। वैसे भी, इस प्रकरण में विश्वामित्र, अजीगर्त,वामदेव आदि का ऐतिहासिक वर्णन है, जबकि मनु जी इनसे काफी पहले हुये थे। यही सिद्ध करता है कि ये श्लोक बहुत बाद में जोड़े गये । विश्वामित्र खुद त्रेतायुग में हुये, मगर मनु तो सृष्टि के आरंभ में हुये थे, तब विश्वामित्र के बाद ही ये श्लोक जोड़े गये हैं। इनमें भी आपात्काल में मांसाहार का समर्थन है, बिना आपात्काल में मांसभक्षण का निषेध मनुस्मृति में है-
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ।।5/51।।
1-जिनकी सम्मति बिना जीव हिंसा न हो सके, 2-शस्त्र से मांस काटने वाला, 3-मारने वाला, 4-बेचने वाला, 5-मोल लेने वाला, 6-बनाने वाला, 7-लाने वाला, 8-खाने वाला, यह आठों घातक (हिंसा करने वाले) ही कहलाते हैं।
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुं इच्छति ।अनभ्यर्च्य पितॄन्देवांस्ततोऽन्यो नास्त्यपुण्यकृत् ।।5/52।।
जो मनुष्य दूसरे के मांस द्वारा अपने मांस को बढ़ाने की इच्छा मात्र करता है उससे अधिक दूसरा पापी नहीं है।।
ऐसे बहुत से प्रमाण हम मनुस्मृति से दे सकते हैं, मगर विस्तारभय से नहीं देदेखिये-
प्रश्न-६-
ऋग्वेद मे (1/162/10)
ऋग्वेद (1/162 /11) मे घोडे की कुर्बानी का जिक्र है ।
घोडे की बलि :
उत्तर- यहां पर मांसाहार नहीं, शाकाहार का वर्णन है-
यदूवध्यमुदरस्यापवाति य आमस्य क्रविषो गन्धो अस्ति । सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेधं शृतपाकं पचन्तु ॥
हे विद्वानो ! (शमितारः) प्राप्त हुए अन्न को सिद्ध करने बनानेवाले आप (यः) जो (उदरस्य) उदर में ठहरे हुए (आमस्य) कच्चे (क्रविषः) क्रम से निकलने योग्य अन्न का (गन्धः) गन्ध (अपवाति) अपान वायु के द्वारा जाता निकलता है वा (यत्) जो (ऊवध्यम्) ताड़ने के योग्य (अस्ति) है तत् उसको (कृण्वन्तु) काटो (उत) और (मेधम्) प्राप्त हुए (श्रृतपाकम्) परिपक्व पदार्थ को (पचन्तु) पकाओ, ऐसे उसे सिद्ध कर (सुकृता) सुन्दरता से बनाये हुए पदार्थों को खाओ ॥१०॥
यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति ।
मा तद्भूम्यामा श्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु ॥
हे विद्वान् ! (निहतस्य) निरन्तर चलायमान हुए (ते) तुम्हारे (अग्निना) क्रोधाग्नि से (पच्यमानात्) तपाये हुए (गात्रात्) हाथ से (यत्) जो शस्त्र (अभि, शूलम्) लखके शूल के समान पीड़ाकारक शत्रु के सम्मुख (अव, धावति) चलाया जाता है (तत्) वह (भूम्याम्) भूमि मैं (मा, आ, श्रिषत्) न गिरे वा लगे और वह (तृणेषु) घासादि में (मा) मत आश्रित हो किन्तु (उशद्भ्यः) आपके पदार्थों की चाहना करनेवाले (देवेभ्यः) दिव्य गुणी शत्रु के लिये (रातम्) दिया (अस्तु) हो ॥११॥
( ऋग्वेद १/१६२/१०,११)
"यहां आम से तात्पर्य शरीर में पचने के बाद जो रस होता है, उसके संदर्भ में है। आयुर्वैदिक प्रयोग में इसे " आम" कहते हैं।
प्रश्न-७-
घोडे को तलवारो से काटा फिर राजा दशरथ ने पाप नाश करने के लिए घोडे की चर्बी के धुंए की गंध को सूंघा फिर घोडे के सभी अंगो को विधि पूर्वक अग्नि में डाला ।
(वालमिकी रामायण बाल कांड) [14/33,37-38]
उत्तर- गीताप्रेस के वाल्मीकीय रामायण में ऐसा कुछ नहीं है, देखिये-

कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समंततः ।
कृपाणैर्विससारैनं त्रिभिः परमया मुदा ॥ ३३ ॥
रानी कौसल्या ने प्रोक्षण आदि से अश्व का संस्कार किया, व अश्व का तलवार से तीन बार स्पर्श किया।३३।।
पतत्रिणस्तस्य वपामुधृत्य नियतेन्द्रियः ।
ऋत्विक्परमसंपन्नः श्रपयामास शास्त्रतः ॥ ३६ ॥
उसके बाद जितेंद्रिय ऋत्विक ने विधिपूर्वक अश्वकंद के गूदे को शास्त्रोक्त विधि से पकाया।।३६।।
धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः ।
यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मनः ॥ ३७ ॥
तब राजा दशरथ ने उस अश्वकंद नामक फल के गूदे की आहुति लेकर उसका धूमगंध लिया।।३७।।
हयस्य यानि चाङ्‍गानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः ।
अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समंत्राः षोडशर्त्विजः ॥ ३८ ॥
उस अश्वमेध यज्ञ में जो दो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको ऋत्विक् ब्राह्मणों ने अग्नि में विधिवत् आहुति दी।।३८।।
पाठकगण! दरअसल यह बालकांड में अश्वमेध का पूरा प्रकरण ही प्रक्षेप प्रतीत होता है, क्योंकि दशरथ को पुत्र चाहिए था,उसके लिये पुत्रेष्टि यज्ञ होता है। अश्वमेध यज्ञ राज्य का विस्तार करने हेतु होता है। अतः केवल पुत्रेष्टि यज्ञ ही उचित है। रामायण के अतिरिक्त पुराणआदि में भी जहां रामकथा है, वहां पर भी पुत्रेष्टि का ही वर्णन हर जगह है, नाकि अश्वमेध का।
रामायण पर मांसाहार के आक्षेपों के लिये बमारे मित्र श्री प्रियांशु सेठ भाई का लेख पढें-

https://aryamaratha.blogspot.com/2018/08/blog-post.html?m=1

हमारा भी एक लेख पढें-

https://aryamaratha.blogspot.com/2018/06/blog-post.html?m=1

प्रश्न-८-
इन लोगो को अपने ही घर धर्म का ज्ञान नही है बैचारे को चले है अहिंसा का पाठ पढाने 😂
उत्तर- हमें अपने धर्म का पूरा ज्ञान है। हमारे धर्म में मांसाहार का हर जगह निषेध है, जहां भी हमारे ग्रंथों में मांसाहार दिखता है, वो धूर्तों ने मिलाया है। रही बात अहिंसा की, तो वो भी सुनिये-
एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ।*
*प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा ।।*
―(२१/१७)
*अर्थात्―*इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारुप परमधर्म की प्रशंसा करते हैं।जैसे मनुष्य को अपने प्राण प्रिय होते हैं, वैसे ही सभी प्राणियों को अपने-अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं।
*अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।*
*अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ।।*
―(२१/१९)
*अर्थ―*अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है, क्योंकि उसी से धर्म की प्रवृत्ति होती है।
*न हि मांसं तृणात् काष्ठादुपलाद् वापि जायते ।*
*हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद् दोषस्तु भक्षणे ।।*
―(२१/२०)
*अर्थ―*मांस तृण से, काष्ठ (लकड़ी) से अथवा पत्थर से पैदा नहीं होता, वह प्राणी की हत्या करने पर ही उपलब्ध होता है, अतः उसके खाने में महान् दोष है।
( महाभारत अनुशासन पर्व)
बताइये मुल्ला जी, इससे बड़ी अहिंसा आपके तथाकथित "शांति के मजहब" में है?
"श्री राम ने हिरण की हत्या किस लिए की ?? किया यह जीव हत्या नही थी ?????"
उत्तर- राम ने मारीच का वध किया,जोकि राक्षस था,हिरन के वेश में। प्रियांशु सेठ जी का ऊपर दिया वेख देखें, और अपनी शंरा मिटा लें।
"जिनको तुम भगवान् मानते हो भगवान् के पिता राजा दशरथ कियो जानवरो की हत्या करता था ?????"
उत्तर- दशरथ जी व्यायाम करने गये थे, शिकार हेतु नहीं। और उन्होंने हाथी जैसे जानवर को सोचकर बाण मारा था। हत्या के लिये नहीं, उसका प्रयोग युद्ध में करने हेतु। ऊपर दिया लिंक खोलकर पढें, प्रियांशु जी का।
शिव जी ने कियो एक मासूम जानवर हाथी की हत्या की ???
यह बात एक पौराणिक गप्प है।
वेदों के एक भाष्यकार आचार्य महीधर ने तो यहाँ तक लिख दिया
ब्रह्मणाराजन्ययोरतिष्ठाकामयोः पुरुष्मेधसंज्ञको यज्ञो भवति !
अर्थात जो ब्राह्मण या क्षत्रिय देवताओं से भी ऊंचे स्तर पर पहुँचना चाहते हों, उन्हें पुरुषमेध (इन्सानों की कुर्बानी) का यज्ञ करना चाहिए। [यजुर्वेद अध्याय 30, मंत्र 2 पर महीधर भाष्य]
उत्तर- महीधर केवल यजुर्वेद का टीकाकार था, "वेदों का" नहीं। और वो एक तांत्रिक था उसने "मंत्रमहोदधि" नामक तांत्रिक पुस्तकों भी लिखी,इसलिये उसके भाष्यों में पशुबलि, हिंसा आदि है। उसने खुद पुरुषमेध यज्ञ के संदर्भ में ३१/१५ में मानसयज्ञ लिखा, यही अर्थ शतपथब्राह्मण के अनुसार है। उसके विरुद्ध कुर्बानी की बात यदि वो करता है, तो उसका लिखा अमान्य है।
प्रश्न-९-
यजुर्वेद में तीसवाँ अध्याय तो पूरी तरह ‘पुरुषमेध’ पर ही है। ऋग्वेद से पता चलता है कि यह यज्ञ संतान प्राप्त करने के लिए भी किया जाता था। ऋग्वेद में शुनःशेप नामक एक व्यक्ति को संतानोत्पत्ति हेतु बलि चढ़ाने का वर्णन है। उसकी बलि देने के लिए उसे यज्ञमंडप के स्तम्भ से बांध दिया गया था। यह अलग बात है कि उसने वरुण देवता की स्तुति की, उसे प्रसन्न किया और वरुण के दर्यादिल होकर उसे मौत के मुंह से बचा दिया। ऋग्वेद में है

शुनःशेपो हयह्वद गर्भीतस्त्रिष्वादित्यं दरुपदेषु बद्धः |
अवैनं राजा वरुणः सस्र्ज्याद विद्वानदब्धो वि मुमोक्तु पाशान ||
अर्थात शुनःशेप ने घृत तीन काठों में आबद्ध हो कर अदिति के पुत्र वरुण का आह्वान किया। विद्वान और दयालू वरुण ने शुनःशेप को मौत के मुंह से बचाया। [ऋग्वेद 1/24/13]
उत्तर- हां, यजुर्वेद में पुरुष मेध यज्ञ लिखा है। उसका अर्थ सब मनुष्यों को आदर सत्कार करना, परमात्मा का हृदय में मानस यज्ञ आदि अर्थों में है। शतपथब्राह्मण, जो यजुर्वेद का व्याख्यान है, उसमें पुरुष मेध में मारने-काटने का स्पष्ट निषेध प्रश्न-१ के जवाब में दिखा चुके हैं ।
रही बात शुनःशेप की,तो यह बात न समझकर पौराणिकों ने अपने ग्रंथों में मनमानी कल्पनायें की हैं। सब कथायें परस्परविरोधी हैं, अतः यह एक अलंकार का ही ऐतिहासीकरण है।
हम इस मंत्र पर शुनःशेप का यौगिक अर्थ महर्षि दयानंद कृत देते हैं-
(शुनः शेपः) शुनो विज्ञानवत इय शेपो विद्यास्पर्शो यस्य सः। श्वा शुपायी शवतेर्वास्याद्गतिकर्मणः। निरु० ३।१८। शेपः शपतेः स्पृशतिकर्मणः। निरु० ३।२१। (यम्) परमेश्वरं सूर्यं वा ।।
विद्वान् लोग (नक्तम्) रात (दिवा) दिन जिस ज्ञान का (आहुः) उपदेश करते हैं (तत्) उस और जो (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मेरे लिये (हृदः) मन के साथ आत्मा के बीच में (केतः) उत्तम बोध (आविचष्टे) सब प्रकार से सत्य प्रकाशित होता है (तदित्) उसी वेद बोध अर्थात् विज्ञान को मैं मानता कहता और करता हूँ (यम्) जिसको (शुनः शेपः) अत्यन्त ज्ञानवाले विद्या व्यवहार के लिये प्राप्त और परमेश्वर वा सूर्य्य का (अह्वत्) उपदेश करते हैं जिससे (वरुणः) श्रेष्ठ (राजा) प्रकाशमान परमेश्वर हमारी उपासना को प्राप्त होकर (अस्मान्) हम पुरुषार्थी धर्मात्माओं को पाप और दुःखों से (मुमोक्तु) छुड़ावे और उक्त सूर्य्य भी अच्छे प्रकार जाना और क्रिया कुशलता में युक्त किया हुआ बोध (मह्यम्) विद्या धन की इच्छा करनेवाले मुझको प्राप्त होता है (सः) हम लोगों को योग्य है कि उस ईश्वर की उपासना और सूर्य्य का उपयोग यथावत् किया करें ॥१२॥

शुनःशेपो ह्यह्वद्गृभीतस्त्रिष्वादित्यं द्रुपदेषु बद्धः ।
अवैनं राजा वरुणः ससृज्याद्विद्वाँ अदब्धो वि मुमोक्तु पाशान् ॥
जैसे (शुनः शेपः) उक्त गुणवाला विद्वान् (त्रिषु) कर्म उपासना और ज्ञान में (आदित्यम्) अविनाशी परमेश्वर का (अह्वत्) आह्वान करता है वह हम लोगों ने (गृभीतः) स्वीकार किया हुआ उक्त तीनों कर्म उपासना और ज्ञान को प्रकाशित कराता है। और जो (द्रुपदेषु) क्रिया कुशलता की सिद्धि के लिये विमान आदि यानों के खम्भों में (बद्धः) नियम से युक्त किया हुआ वायु ग्रहण किया है। वैसे वह लोगों को भी ग्रहण करना चाहिये जैसे-जैसे गुणवाले पदार्थ को (अदब्धः) अति प्रशंसनीय (वरुणः) अत्यन्त श्रेष्ठ (राजा) और प्रकाशमान परमेश्वर (अवससृज्यात्) पृथक्-पृथक् बनाकर सिद्ध करे। वह हम लोगों को भी वैसे ही गुणवाले कामों में संयुक्त करे। हे भगवन् परमेश्वर ! आप हमारे (पाशान्) बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वाइये। इस प्रकार हम लोगों की क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुये प्राण आदि पदार्थ (पाशान्) सकल दरिद्ररूपी बन्धनों को (विमुमोक्तु) बार-बार छुड़वा देवें वा देते हैं ॥१३॥

इस मन्त्र में भी लुप्तोपमा और श्लेषालंकार हैं। परमेश्वर ने जिस-जिस गुणवाले जो-जो पदार्थ बनाये हैं उन-उन पदार्थों के गुणों को यथावत् जानकर इन-इन को कर्म उपासना और ज्ञान में नियुक्त करे जैसे परमेश्वर न्याय अर्थात् न्याययुक्त कर्म करता है वैसे ही हम लोगों को भी कर्म नियम के साथ नियुक्त कर जो बन्धनों के करनेवाले पापात्मक कर्म हैं उनको दूर ही से छोड़कर पुण्यरूप कर्मों का सदा सेवन करना चाहिये ॥१३॥
अतः शुनःशेप परमात्मा, सूर्य व जीव के संदर्भ में है। आपका दिया अर्थ भी मान लें, तो इससे यही सिद्ध है कि शुनःशेप कोई पुरुष है,जो भव सागर में फंसा है और परमात्मा से प्रार्थना कर रहा है। "वरुण" वरण करने योग्य परमात्मा ही है।
प्रश्न-१०-
ऋग्वेद के व्याख्यान रूप ‘एतेरेय ब्राह्मण’ (काण्ड 7, अध्याय 3) में इस प्रसंग को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि राजा हरिश्चंद्र की कोई संतान न थी। अतः उसने वरुण की मनौती की। वरुण ने प्रसन्न होकर कहा, ‘तुम्हारी संतान तो होगी लेकिन तुम्हें बलि देनी होगी।” राजा ने रोशीत नाम का बेटा जन्मा। वरुण को दिए गए वचन की पूर्ति के लिए उस ने अजीगर्त ऋषि के पुत्र शुनःशेप को खरीद कर बलि चढ़ाना तय किया। उस यज्ञ में काटने के लिए नियुक्त व्यक्ति को 100 गौएँ दी गईं। जब बलि चढ़ाने में कुछ ही क्षण शेष थे, तब शुनःशेप ने वरुण की स्तुति की और उसे प्रसन्न कर अपनी जान बचाई।
शांखायान ब्रहमान और ब्रहमपुराण में भी यही विवरण मिलता है। परन्तू ब्रह्म पुराण में इतना अंतर है कि शुनःशेप को विश्वामित्र ने अपना ज्येष्ठ पुत्र बनाकर बचाया था, न कि वरुण ने उसकी रक्षा की थी।
यहाँ यह बताना उचित है कि इसी विश्वामित्र पर जब नरमेध का भूत सवार हुआ तो उसने अपने प्रत्येक बेटे को बलि पशु बनने के लिए कहा था। विश्वामित्र के 100 बेटे थे। जब भी इस धार्मिक कृत्य में अपनी हत्या करवाने के लिए तैयार न हुआ तो उसने उन्हें शाप से डाला कि जाओ, तुम नीच बन जाओ और एक हज़ार साल तक कुत्ते के मांस पर गुज़ारा करो। [वाल्मीकि रामायण बालकांड सर्ग 62]
श्व मांस भोजिनः सर्वे वासिष्ठा इव जातिषु |पूर्णम् वर्ष सहस्रम् तु पृथिव्याम् अनुवत्स्यथ
उत्तर- ऐतरेय ब्राह्मण में यह कथा आई है, पर किसी ने भी इसका वैज्ञानिक अर्थ न समझा। आचार्य अग्निव्रतनैष्ठिक जी "ऐतरेय ब्राह्मण" का वैज्ञानिक भाष्य "वेदविज्ञान आलोक" में कर चुके हैं। उनकी भाष्यभूमिका "ऐतरेय ब्राहर्मण विज्ञान" में इस कंडिका का वैज्ञानिक अर्थ खोला गया सो, उनके ग्रंथ में देख लेंवे ।
और आपने खुद शुनःशेप की कथा में भेद दिखा ही दिया।
पाठकगण! वेद में मांसाहार का निषेध है। कुछ प्रमाण देखें-
हे मनुष्यों ! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं - यजुर्वेद १।१
जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणी मात्र को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं-यजुर्वेद ४०। ७
हे दांतों तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं । तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो।- अथर्ववेद ६।१४०।२
वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए- अथर्ववेद ८।६।२३
निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद १०।१।२९
इन मन्त्रों में स्पष्ट रूप से यह सन्देश दिया गया हैं कि वेदों के अनुसार मांस भक्षण निषेध हैं।
http://vedictruth.blogspot.com/2015/01/blog-post_10.html?m=1
लेख का सार-
"तो साबित हुआ कि हिन्दू धर्म में इन्सानों की बलि दी जाती थी।
इनका जवाब दो पहले फिर इस्लाम पर उंगली उठाना ।"
नहीं मुल्लाजी, साबित नहीं हुआ। आपने जितने भी प्रमाण दिये, या तो झूठे हैं या फिर प्रक्षेप हैं। वेद में आप कहीं भी मांसाहार सिद्ध न कर सके, जो प्रमाण दिया- उसमें मांसाहार है ही नहीं। जो मनुस्मृति, महाभारत आदि की बात की,उनमें खुद प्रक्षेप हैं, और उनके मुख्य प्रकरण में अनेक जगह मांसाहार, पशुबलि आदि का खंडन है। नरबलि का तो स्पष्ट खंडन शतपथब्राह्मण व ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है।हमने जवाब दे दिया है, इस्लाम पर हम ऊंगली नहीं, मिसाइल दागेंगे, मगर अगली पोस्ट में।
आशा है कि पाठकों ने इस लेख से भरपूप ज्ञानलाऊ उठाया होगा। अब आज्ञा दें।
नमस्ते ।
ओ३म् ।