सीता स्वयंवर

।। ओ३म्  ।।



     हमारी सियाकुमारी ऐसी बलिष्ठ वीरांगना थीं कि प्रतिदिन सारे घर मे झाडू लगाती थीं  और जिस कमरे में धनुष रखा था, जब वहाँ लीपने जातीं  तो बताएँ हाथ से धनुष उठाकर थामे रहतीं और दाएँ हाथ से उसके नीचे का फर्श लीप कर वहीं रख देती थीं । कितना बडा़  था वह धनुष ? वाल्मीकि रामायण में लिखा है - - जब राम-लक्ष्मण को दिखाने के लिए वह धनुष बाहर लाया गया तो -

नृणां शताननिपञ्चाशद् व्यायतानां महात्मनाम् ।
मञ्जूषामष्टचकां तां समूहस्ते कथंचन ।।

     वह धनुष आठ पहियों वाली लोहै की पेटी में रखा था और पाँच हजार वीर पुरूष किसी प्रकार उसे खींचकर लाए ।

    जनक यह सब देखते तो सोचते कि ऐसी बेटी तो ऐसै शूरवीर को सौंपनी चाहिए जो इस धनुष को केवल उठाये ही नहीं  तोड़ भी दे । तभी जोडी ठीक बैठैगी । यह वह धनुष था जिसे स्वयंवर सभा में रावण हिला तक नहीं सका । इससे स्पष्ट है कि सीता की अपेक्षा रावण बहोत कमजोर था ।

     जब रावण की अपेक्षा सीता में कहीं अधिक शक्ति थी तो वह सीता को जबरदस्ती कैसै उठा ले जा सकता था ? इसका परिहार करने के लिए लोगों  ने मनमानी कल्पनाएँ कर डाली । किसी ने कहा कि जिस सीता को रावण उठा ले गया था वस तो नकली सीता थी, असली तो एक गुफा में  सुरक्षित थी । पर उसे रावण से सुरक्षा कि जरुरत भी नजर नही आती इस प्रकरण से ।

     किसी कवि की कल्पना के अनुसार जब हरिण ( स्वर्ण मृग ) का रूप धारण किए हुए मारीच ने मरते समय ? ' हा राम ! हा लक्ष्मण ! ' की पुकार की ओर लक्ष्मण को सीता को अकेली छोड़कर जाना पड़ा था तो वह धनुष की नोक से एक रेखा खींचकर सीता को किसी भी अवस्था में बाहर न आने का आदेश दे गए । यदि सीता को रेखा को पार न करती तो रावण उन्हें उठाकर नहीं ले जा सकता था । यह रेखा ' लक्ष्मण रेखा ' के नाम से प्रसिद्ध है और लोक व्यवहार में सीमा के अर्थ में इसका प्रयोग होता है । परन्तु वाल्मीकि रामायण में ही नहीं,  तुलसी के रामचरितमानस में भी कहीं उल्लेख नहीं मिलता । सीता के अत्याधिक आग्रह करपे पर लक्ष्मण - ' गच्छामि यत्र काकुत्स्थः स्वाति तेऽस्तु वरानने ' ( युद्धकाण्ड 45/32) इतना कहकर राम के पास चल दिए ।

सीता के विषय में  तुलसीदास ने अवश्य एक कल्पना की । उन्होंने  लिखा है -

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा । जौं लगि करउँ निसाचर नासा ।।
जब राम सबु कहा बखानी । प्रभु पद धरि हिय अनल समानी ।।
निज प्रतिबिम्ब राखि तहँ सीता । तैसइ सील रूप सुविनीता ।।
- अरण्यकाण्ड 29/1-2

     रामचन्द्र जी ने सीता से कहा --- जबतक मैं राक्षसों का नाश करूँ तब तक तुम अग्नि में निवास करो । ज्योंही रामचन्द्र जी ने यह कहा त्योंही सीता अग्नि में समा गई । वे अपने प्रतिबिम्ब ( छायारुपिणी सीता ) को वहाँ रख गई जिसका शील और रुप बिल्कुल वैसा ही था ।

     इसके अनुसार रावण सीता के प्रतिबिम्ब को ले गया था, सीता को नहीं । प्रसंगवश यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि अग्नि का एक नाम ' हुताशन ' है, क्योंकि उसमें कुछ डाला जाता है उसे वह भस्म कर देती है । किसी-किसी ने यहाँ तक कह डाला कि रावण के साथ सीता अपनी इच्छा से गई थी ।

वस्तुतः मूल में भूल हो जाने के कारण एक झूठ को सच बनाने की प्रक्रिया में सौ झूठ बनाने पड़ते हैं ।

     प्रथम तो एक राजकुमारी के महल में झाडू-पोछा लगाने का प्रश्न ही नहीं उठता । फिर वाल्मीकि रामायण में राजा जनक की सभा में रावण के आने का कोई उल्लेख नहीं है । तब उसके धनुष उठाने न उठाने की चर्चा कैसे हो सकती है ?

     सच तो यह है सीता के स्वयंवर की बात ही सर्वथा मिथ्या है । स्वयंवर में कन्या बहुतों में से अपनी पसन्द के अनुरूप किसी एक को अपने पति के रुप में चुनती है ---- उसका वरण करती है । वीर्यशुक्ला होने के कारण सीता अपनी पसन्द के अनुरुप पति का चुनाव करने में स्वतंत्र नहीं  थी । स्वयं जनक के शब्दों में उसका विवरण इसप्रकार है -

वरयामासुरागत्य राजानो मृनिपुङ्गव ।
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् ।। 16 ।।
वीर्यशुल्केति भगवन्न ददामि सुतामहम् ।
ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुङ्गव ।। 17 ।।
मिथिलामभ्युपागम्य वीर्यजिज्ञासवस्तदा ।
तेषां जिज्ञासमानानां वीर्यं धनुरुपाहृतम् ।। 18 ।।
न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा ।
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्यं ज्ञात्वा महामुने ।। 19 ।।
प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन । 20 ।
यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने ।
सीतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेऽहम् ।। 26 ।।
बालकाण्ड 66/-19,26

हे मुनिवर ! मेरी पुत्री सीता को कई राजाओं ने आकर मांगा । कन्या का वरण करने वाले उन सभी राजाओं को मैंने बता दिया कि मेरी पुत्री वीर्यशुल्का है । यही कारण है कि मैंने अपनी पुत्री अभी तक किसी को नहीं दी । तब सभी राजा मिलकर मिथिला में आये और पूछने लगे कि राजकुमारी को प्राप्त करने के लिए शुल्करूप में क्या पराक्रम निश्चित किया है ? मैंने जिज्ञासा करने वाले उन राजाओं के सामने यह धनुष रख दिया । परन्तु उनमें से कोई भी इसे उठाने या हिलाने में समर्थ न हो सका । उन पराक्रमी नरेशों की शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने अपनी कन्या उन्हें देने से इन्कार कर दिया । यदि राम इस धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी कन्या उन्हें दे दूंगा । तब ----

महर्षेर्वचनाद्रामो यत्र तिष्ठति तद्धनुः ।
मञ्जूषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत् ।।13।।
इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना ।
यत्नवांश्व भविष्यामि तोलने पूरणेऽपिवा ।।14।।
बाढमित्यब्रवीद् राजा मुनिश्च समभाषत ।
लीलया स धपुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेः ।।15।।
पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनन्दनः ।
आरोपयत् स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः ।।16।।
आरोपयित्वा मौर्वीं च पूरयामास तद्धनुः ।
तद् बभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः ।।17।।
मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुलकेति कौशिक ।
सीता प्राणैर्बुहुमता देया रामाय मे सुता ।।23।।
बालकाण्ड 67/13-17,23

     महर्षि की आज्ञा से श्रीराम ने जिसमें वह धनुष था उस पेटी को खोलकर उसमे रखे धनुष को देखा और कहा --- " अच्छा, अब मै इस धनुष को हाथ लगाता हूँ । इसे उठाने और प्रत्यंचा चढ़ाने का भी प्रयत्न करुँगा । " ऋषि और जनक की अनुमति पाकर राम ने उस धनुष को बीच से पकड़ कर, माने खेल-खेल में,  उठा लिया और सहस्त्रों लोगों के देखते-देखते उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी । प्रत्यंचा चढ़ाकर राम ने उस धनुष को कानतक खींचा ही था कि वह बीच से टूट गया । यह देखकर जनक बोले -- मुनिवर ! मैंने वीर्यशुल्का बताकर जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य और सफल हो गई । मैंने अपनी प्राणों से प्यारी बेटी सीता श्रीराम को समर्पित करूँगा ।

     पिता द्वारा घोषित शर्त के अनुसार जो भी धनुष तोड़ देता उसके गले में वरमाला डालने के लिए सीता बाध्य थी । इससे स्पष्ठ होता है कि सीता का स्वंयवर कभी हुआ ही नही था तो रावण वहा आकर धनुष ना उठा सके और बाद मे वह खुद सीता को उठा ले और सीता उसका विरोध तक न कर पाये ।


इस मिथक से बाहर आकर सोचे ।
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सन्दर्भ :- रामायण भ्रांतियां और समाधान => स्वामी विद्यानंद सरस्वती  
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नागराज आर्य 

धर्मवीर छत्रपती संभाजी महाराज व मनू (मनुस्मृती)

राज सभासद व मंत्री यांचे लक्षण कसे असावे या बाबत

निर्वर्तेतास्य यावद्भिरितिकर्तव्यता नृभिः ।
तावतोऽतन्द्रितान्दक्षान्प्रकुर्वीत विचक्षणान् || ६१ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ६१ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४१

भावार्थ :-जितने मनुष्यों से कार्य्य सिद्ध हो सके उतने आलस्यरहित बलवान् और बड़े-बड़े चतुर प्रधान पुरुषों को (अधिकारी) अर्थात् नौकर करे | - ( सत्यार्थ प्रकाश ६ षष्ठसमुल्लास )

मराठी भावार्थ :-(अस्य) या राजाचे (यावभ्दि नृभि: इतिकर्तव्यता निवर्तेत) जितक्या मनुष्यांकडून कार्य सिद्ध होऊ शकेल (तावत:) तितक्या (अतन्द्रितान् ) आळसरहित (दक्षान् ) दक्ष - सावध आणि (विचक्षणान् ) मोठमोठया चतुर मुख्य पुरूषांना (प्रकुर्वीत) अधिकारी म्हणजे नोकर म्हणून नियुक्त करावे ।। ६१।। (स.प्र. १४७)
अनुशीलन- ‘इतिकर्तव्यता’ याचा अभिप्राय- येथे ‘इति’ शब्द ‘अथ’ च्या विरूद्धार्थी आहे. याचा अर्थ आहे ‘पूर्णता’ किंवा ‘समाप्ती’. अशाप्रकारे ‘इतिकर्तव्यता’ म्हणजे ‘सर्व राज्यकार्यांची पूर्णता’ जितक्या अमात्य किंवा अधिका-यांकडून राज्यसंचालनाचे कार्य पूर्णरूपात संपन्न होऊ शकेल, तितक्यांची राजाने नियुक्ती करावी. पुन्हा त्यांच्या हाताखाली इतर साहाय्यक अधिका-यांची , भृत्यांची निुयक्ती करावी. हे पुढील श्लोकातील ‘तेषामर्थे’ पदावरून स्पष्ट होते. पुढील श्लेाकाची याच्याशी वाक्यगत संगती आहे-|| ६१ ||


तेषां अर्थे नियुञ्जीत शूरान्दक्षान्कुलोद्गतान् ।
शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तर्निवेशने । || ६२ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ६२ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४२

भावार्थ :-इन के आधीन शूरवीर बलवान् कुलोत्पन्न पवित्र भृत्यों को बड़े-बड़े कर्मों में और भीरु डरने वालों को भीतर के कर्मों में नियुक्त करे |

मराठी भावार्थ :-(तेषाम अर्थे) त्यांच्या अधीन (शूरान्) शूरवीर (दक्षात्) बलवान (कुलोद्गतान्) कुलोत्पन्न (शुचीन्) पवित्र भृत्यांची (आकरकर्मान्ते) मोठयामोठया कामावर, आणि (भीरून अन्तर्निवेशने) भीरू उ भेकडांची आतल्या कामावर (नियुञ्जीत) नियुक्ती करावी || ६२ ||

राजाचे युद्धा विषयी कर्तव्य

आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः || ८९ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ८९ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ५६९

भावार्थ :-जो संग्रामों में एक दूसरे को हनन करने की इच्छा करते हुए राजा लोग जितना अपना सामथ्र्य हो बिना डरे, पीठ न दिखा युद्ध करते हैं वे सुख को प्राप्त होते हैं । इससे विमुख कभी न हो किन्तु कभी - कभी शत्रु को जीतने के लिए उनके सामने छिप जाना उचित है । क्यों कि, जिस प्रकार से शत्रु को जीत सके वैसे काम करें । जैसे सिंह क्रोधाग्नि में सामने आकर शस्त्राग्नि में शीघ्र भस्म हो जाता है, वैसे मूर्खता से नष्ट - भ्रष्ट न हो जावें । ( सत्यार्थ प्रकाश ६ षष्ठसमुल्लास )

मराठी भावार्थ :-(आहवेषु) जे युद्धामध्ये (मिथ:) परस्पर (अन्य: अन्यं जिघांसन्त:) एक दुस-यास हनन करण्याची इच्छा करीत (महीक्षित:) राजे लोक (परं शक्त्या अपरामुखा:) जेवढे बळ - सामर्थ्य असेल, त्यानिशी न भिता, शत्रूस पाठ न दाखविता (युद्धमाना:) युद्ध करतात, ते (स्वर्गं यान्ति) सुखास प्राप्त होतात.
           ‘‘यापासून विमुख - कधीही होऊ नये. पण कधी कधी शत्रूस जिंकण्यासाठी दबाधरून बसावे लागते. लपाने लागवे. कारण, कोणत्याही मार्गाने का असेना शत्रूस जिंकण्यासाठी उचित कार्यवाही करणे आवश्यक असते. सिंह ज्याप्रमाणे क्रुध्द होऊन समोरच्या शस्त्राग्नीमध्ये लवकरच भस्म होतो , तसे मूर्खपणाने नष्ट - भ्रष्ट होऊन जाऊ नये ||८९||

राजाची दक्षता

मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया ।
सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः || १११ || मनू.अध्याय ७ श्लोक १११ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ६२८

भावार्थ :-जो राजा मोह से, अविचार से अपने राज्य को दुर्बल करता है, वह राज्य और अपने बन्धुसहित जीवन से पूर्व ही शीघ्र नष्ट भ्रष्ट हो जाता है | ( सत्यार्थ प्रकाश ६ षष्ठसमुल्लास )

मराठी भावार्थ :-(य: राजा) जो राजा (मोहात् अनवेक्षया ) मोहाने, अविचाराने (स्वराष्ट्रं कर्षयति) आपले राज्य दुबळे करतो (स:) तो (राज्यात्) राज्यासह (च) आणि (सबान्धव: जीवितात्) बांधवासह जगण्यापूर्वीच (अचिरात्) लवकर (भ्रश्यते) नष्ट - भ्रष्ट होतो ||१११||

ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा ।
विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिं एव च || ११५ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ११५ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ६३०

भावार्थ :-एक-एक ग्राम में एक-एक प्रधान पुरुष को रक्खें उन्हीं दश ग्रामों के ऊपर दूसरा, उन्हीं वीश ग्रामों के ऊपर तीसरा, उन्हीं सौ ग्रामों के ऊपर चौथा और उन्हीं सहस्र ग्रामों के ऊपर पांचवां पुरुष रक्खे ।। अर्थात् जैसे आजकल एक ग्राम में एक पटवारी, उन्हीं दश ग्रामों में एक थाना और दो थानों पर एक बड़ा थाना और उन पांच थानों पर एक तहसील और दश तहसीलों पर एक जिला नियत किया है यह वही अपने मनु आदि धर्मशास्त्र से राजनीति का प्रकार लिया है  | ( सत्यार्थ प्रकाश ६ षष्ठसमुल्लास )

मराठी भावार्थ :-(ग्रामस्य अधिपतिं कुर्यात्) एकेका गावात एकेक प्रमुख पुरूष ठेवावा (तथा दशग्रामपतिम्) त्या दहांवर दुसरा (विंशति ईशम्) अशा वीस गावांवर तिसरा (शत ईशम्) अशा शंभर गावांवर चौथा(च) आणि (सहस्त्रपतिम् एव) अशा हजार गावांवर पाचवा पुरूष ठेवावा ।
       अर्थात जसे आजकाल एका गावात एक कुलकर्णी, अशा दहा गावांवर एक ठाणे, आणि दोन ठाण्यांसाठी एक मोठे ठाणे, आणि या पाच ठाण्यांवर एक तहसील आणि दहा तहसीलीवर एक जिल्हा नेमला आहे ||११५||


अराजके हि लोकेऽस्मिन्सर्वतो विद्रुतो भयात् ।
रक्षार्थं अस्य सर्वस्य राजानं असृजत्प्रभुः  || ३ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ३ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४८३

भावार्थ :- क्यों कि राजा के बिना इस जगत् में सब ओर भय के कारण व्याकुलता फैल जाने पर इस सब राज्य की सुरक्षा के लिए प्रभु ने ‘राजा के पद को बनाया है अर्थात् राजा बनाने की प्रेरणा मानवों के मस्तिष्क में दी है ।  |

मराठी भावार्थ :-(हि) कारण (अराजके अस्मिन् लोके ) राजा नसल्यास या जगात (सर्वत: भयात् विद्रुते) चोहीकडे भय, व्याकुळता पसरल्यामुळे (यस्य सर्वस्य रक्षार्थम्) या सर्व समाजाच्या व राज्याच्या सुरक्षितेसाठी (प्रभु: राजानम् असृजत्) प्रभूने , ‘राजा’ पद बनविले आहे, अर्थात राजा बनविण्याची प्रेरणा मानवांच्या मेंदूत दिली आहे ||३||

इन्द्राऽनिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्र निर्हृत्य शाश्वतीः || ४ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ४ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४८४

भावार्थ :-यह सभेश राजा इन्द्र अर्थात् विद्युत् के समान शीघ्र ऐश्वर्यकत्र्ता वायु के समान सबको प्राणवत् प्रिय और हृदय की बात जानने हारा यम – पक्षपातरहित न्यायाधीश के समान वत्र्तने वाला सूर्य के समान न्याय धर्म विद्या का प्रकाशक, अंधकार अर्थात् अविद्या अन्याय का निरोधक अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने हारा वरूण अर्थात् बांधने वाले के सदृश दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला चन्द्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरूषों को आनन्ददाता, धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे । ( सत्यार्थ प्रकाश ६ षष्ठसमुल्लास )

इनकी स्वाभाविक मात्राओं – अंशों का सार लेकर ‘राजा के व्यक्तित्व का निर्माण किया है ।

(1) इन्द्र, (2) यमराज, (3) वायु, (4) सूर्य, (5) अग्नि, (6) वरुण, (7) चन्द्रमा, (8) कुबेर, इन आठों के अंश से श्री ब्रह्माजी ने राजा को उत्पन्न किया।

टिप्पणी :
राजा के आठ कार्य हैं-1. इन्द्र से पालन, 2. यमराज से न्याय, 3. सूर्य से प्रकाश अर्थात् शिक्षोन्नति, 4. अग्नि से पवित्रवेद को पृथक करना, 5. चन्द्रमा से प्रजा को प्रसन्न करने का प्रयत्न करना, 6. वरुण से शांति स्थापित करना, 7. कुबेर से धन की रक्षा करना। 1-श्लोक 10 में रूप धारण करने से यह तात्पर्य है कि राजा पालन करने के समय इन्द्र व न्याय समय यमराज तथा शिक्षा प्रचार के समय सूर्य आदि का रूप हो जाता है।

मराठी भावार्थ :- हा सभेश राजा (इन्द्र) इंद्र म्हणजे विजेसमान चपल, ऐश्वर्यकर्ता (अनिल) वायुसमान सर्वांसाठी प्राणवत प्रिय आणि हृदयाची स्थिती जाणणारा (यम) यम- पक्षपातरहित न्यायाधीशाप्रमाणे वर्तन असणारा (अर्काणाम्) सूर्याप्रमाणे न्याय, धर्म, विद्येचा प्रकाशक, अंधकाराचा म्हणजे अविद्या, अन्यायाचा निरोधक, (अग्ने:) अग्नीसमान दुष्टांना भस्म करणारा (वरूणस्य) वरूण म्हणजे बांधणारा - दुष्टांना अनेकप्रकारे बांधणारा (चन्द्र वित्ते- शयो:) चंद्रासारखा श्रेष्ठ पुरूषांना आनंद देणारा, धनाध्यक्षाप्रमाणे कोश समृद्ध करणारा सभापती असावा (शाश्वती: मात्रा निर्हृत्य च ) वर सांगितलेल्यांच्या स्वाभविक मात्रा गुणांच्या अंशाचा सार घेऊन ईश्वराने ‘राजा’ चे व्यक्तित्व निर्माण केले आहे. (च) हि पूर्वीच्या श्लोकाच्या‘राजानम् असृजत्’क्रियेची अनुवृत्ती आहे. ) ।। ४।। 

अनुशीलन - राजाच्या आठ विशिष्ट गुणांचे विस्तृत वर्णन - (व्याख्या )-
(क) महर्षी मनूंनी या श्लोकात म्हटले आहे की राजा हा आठ विशिष्ट गुणांनी युक्त असला पाहिजे. ज्याप्रमाणे खालील आठ ईश्वरीय दिव्य व्यक्तींचे कार्य किंवा स्वभाव असतो, तसाचा राजाचा स्वभाव व आचरण असले पाहिजे. मनूंनी ९।३०३ ते ३११ श्लोकांमध्ये स्वत:च या गुणांचे सविस्तर वर्णन केले आहे ते असे -

(१) इंद्र (वृष्टिकारक) ज्याप्रमाणे विपुल वृष्टी करून जगास तृप्त करतो, त्याप्रमाणे राजाने प्रजेस विविध सुख - सुविधा देऊन ऐश्वर्यही द्यावे. प्रजेच्या कामना पूर्ण करून संतुष्ट ठेवावे (९।३०४). इदि परमैश्वर्ये भ्वादि धातूशी ‘ऋजेन्द्राग्नवज्र’ (उणादि २।२८) सूत्राच्या ‘रन’ प्रत्ययाच्या संधीने ‘इन्द्र’ शब्द सिद्ध होतो. ‘इन्दते वा ऐश्वर्यकर्मण:’’
(निरूक्त १०।८) ऐश्वर्यप्रदाता असल्यामुळे इंद्र म्हणविला जातो (७।७) मध्ये याच्या पर्यायवाची रूपात ‘महेन्द्र’ चा उपयोग आहे.

(२) वायू- जसा सर्व प्राण्यांच्या ठिकाणी प्रविष्ट होऊन वावरतो, त्याच प्रमाणे राजाने आपल्या गुप्तहेरांकडून सर्वत्र संचार करून आपल्या प्रजेची व शत्रूंच्या प्रजेची माहिती घेत राहावे (९।३०६). (वायु: वा गतिगन्धयो: आदादी धातू ‘क्रवायाजि.’ (उणादि १।१) सूत्राचा ‘उ’ प्रत्यय ‘वायुर्वातेर्वेत्तेर्वा स्याद् गमिकर्मण:’ (निरू. ११।५). ९।३०६ मध्ये ‘मारूत’ चा उपयोग आहे.

(३) यम (ईश्वराची मारक किंवा नियंत्रक शक्ती) = ज्याप्रमाणे कर्मफळाची वेळ आल्यावर प्रिय आणि शत्रू, सर्वांना धर्मपूर्वक म्हणजे न्यायानुसार शिक्षा करतो किंवा मारतो, त्याच प्रकारे राजानेही अपराध केल्यावर प्रिय, शत्रू, सर्व प्रजेस न्यायपूर्वक शिक्षा केली पाहिजे आणि आपल्या नियंत्राणाखाली ठेवले पाहिजे (९।३०७). ७।७ मध्ये मनूनीं यमास ‘धर्मराट्’ असा पर्यायवाची शब्द घेतला आहे. धर्म म्हणजे न्यायपूर्वक शासन करणारा तो ‘धर्मराट्’ झ्र् ‘यमु उपरमे’ भ्वादि धातूचा कर्तरि पचाद्यच् ‘‘यम: यच्छतीति सत:’’ (निरू. १०।१९).ट

(४) अर्क उ सूर्य ज्याप्रमाणे आपल्या किरणांनी न तापविता पाणी ग्रहण करतो (वाष्प रूपात ), त्याचप्रमाणे राजाने प्रजेस कष्ट न देता, हानी न करता (७।१२८- १२९) कर गोळा करावा (९।३०५). (अर्च पूजायाम् भ्वादि धातूपासून ‘कृदाधारर्चिकलिभ्य:क:’ (उणादि ३।४०) सूत्रास ‘क:’ प्रत्यय). ९।३०५ मध्ये पर्यायवाची रूपात ‘आदित्य’ उपयोजिला आहे.

(५) अग्नी - ज्याप्रमाणे अग्नी अशुद्धीचा नाश करून शुद्धी करणारा असतो. आणि तेजयुक्त असतो, त्याचप्रकारे राजा अपराध, हानी व दुष्टपणा करणा-यांना व त्रास देणा-यांना प्रभावीपणे शिक्षा करणारा व दंडाद्वारे सुधारणा करणारा असावा.( ९।३१०) (अगि- गतौ धातूपासून ‘अड्.गेर्नलोपश्च’(उणादि ४। ५०) सूत्रास ‘नि:’ प्रत्यय, नि लोप:)

(६) वरूण - पाण्याच्या लाटा आणि भोवरा यांच्या पाशात प्राण्यांना अडकावितो, त्याप्रमाणे राजाने अपराध्यांना आिंण शत्रूंना बंधनात किंवा करागृहात टाकावे (९।३०८). (वृत्र - वरणे) स्वादि धातूपासून ‘कृवृदारिभ्य उनन्’ (उणादि ३।५३ ) सूत्रास ‘उनन्’ प्रत्यय).

(७) चंद्र - जसा चंद्र शीतळपणा देतो, आणि पूर्णिमेचा चंद्र पाहून जसे मन प्रसन्न होते, त्याचप्रकारे राजा प्रजेस शांती आणि आनंद देणारा असावा. त्यास राजाच्या रूपात पाहून प्रजेस हर्ष व्हावा(९।३०६).(चदि आल्हादने दीप्तौ च स्वादिधातूपासून ‘स्फायितत्र्जिवत्र्चि:’ (उणादि २।१३) सूत्राचा ‘रक्’ प्रत्यय). ७।७ मध्ये ‘सोम’ पर्यायवाचक आहे.

(८) वित्तेश, म्हणजे धनाढय ७।७ मध्ये कुवेर आणि ९।३११ मध्ये याचा पर्यायवाची रूपात ‘धरा’ ‘पृथ्वी’ शब्द वापरला आहे. ज्याप्रमाणे धरती किंवा धनस्वामी परमेश्वर समभावाने सर्व प्राण्यांचे पालन - पोषण करतो, त्याचप्रकारे राजाने पक्षपातरहित होऊन समभावाने प्रजेचे पुत्रवत पालन करावे (९।३११)

यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ।|| ५ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ५ / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४८५

भावार्थ :-क्योंकि देवताओं के अंश से राजा की उत्पत्ति है अतएव राजा सब भूतों (जीवों) को अपने तेज से वश में करता है।  |

मराठी भावार्थ :-(यस्मात्) कारण (एषां सुरेन्द्राणम्) या (७।४) शक्तिशाली इंद्र आदी दिव्यशक्तींच्या (मात्राभ्य:) सारभूत गुणारूपी अंशापासून (नृप: निर्मित:) ‘राजा’पद बनविले आहे. (तस्मात्) म्हणूनच (एष:) हा राजा (तेजसा) आपल्या तेज शक्तीप्रभावाने (सर्वभूतानि अभिभवति) सर्व प्राण्यांना वशीभूत आपल्या नियंत्रणात व पराजित ठेवतो ||५||

राजरक्षणाचे उपाय

धन्वदुर्गं महीदुर्गं अब्दुर्गं वार्क्षं एव वा ।
नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत्पुरम्  || ७० || मनू.अध्याय ७ श्लोक ७० / बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ११४

भावार्थ :-धन्वदुर्ग – मरूस्थल में बना किला जहां मरूभूमि के कारण जाना दुर्गम हो महीदुर्ग – पृथिवी के अन्दर तहखाने या गुफा के रूप में बना किला या मिट्टी की बड़ी – बड़ी मेढ़ों से घिरा हुआ जलदुर्ग – जिसके चारों ओर पानी हो अथवा वृक्षदुर्ग – जो घने वृक्षों के वन से घिरा हो नृदुर्ग – जो सेना से घिरा रहे, जिसके चारों ओर सेना वा निवास हो अथवा गिरिदुर्ग – पहाड़ के ऊपर बना या पहाड़ों से घिरा किला बनाकर और उसका आश्रय करके अपने निवास में रहे ।

महर्षि दयानन्द ने ‘धन्वदुर्गम् के स्थान पर ‘धनुदुर्गम् पाठ लेकर इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया है –
इसलिये सुन्दर जंगल, धन धान्ययुक्त देश में (धनुर्दुर्गम्) धनुर्धारी पुरुषों से गहन (महीदुर्गम्) मट्टी से किया हुआ (अब्दुर्गम्) जल से घेरा हुआ (वार्क्षम्) अर्थात् चारों ओर वन (नृदुर्गम्) चारों ओर सेना रहे (गिरिदुर्गम्) अर्थात् चारों ओर पहाड़ों के बीच में कोट बना के इस के मध्य में नगर बनावे |

मराठी भावार्थ :-(धनदुर्गम्) धन्वदुर्ग: - मरूस्थळी बनविलेला किल्ला जेथे मरूभूमीमुळे जाणे दुर्गम होते (महीदुर्गम्) भुईकोट किल्ला, किंवा तळघराच्या किंवा गुहेच्या रूपातील किल्ला, किंवा मातीच्या मोठयामेाठया ढिगा-यांनी वेढलेला किल्ला, (अप दुर्गम्) जलदुर्ग - ज्याच्या चोहोबाजून पाणी असेल (वा) अथवा( वार्क्षम्) वृक्षदुर्ग- ज्याच्या चोहोबाजूनी मोठमोठे वृक्ष असतात (नृदुर्गम्) नृदुर्ग - जो सैन्याने वेढलेला असतो, ज्याच्या चोहीबाजूस सैन्याची निवासस्थाने असतात (वा) अथवा (गिरिदुर्गम्) गिरिदुर्ग - डोंगरावर बांधलेला डोंगरांनी वेढलेला किल्ला (समाश्रियत्य) याचा आश्रय करून (पुरू वसेत्) आपल्या निवासात राहावे ।। ७०।।
           
महर्षी दयांनदांनी ‘धन्वदुर्गम्’ ऐवजी ‘धनुर्दुर्गम’ पाठ घेऊन या श्लोकाचा अर्थ असा लावला आहे-
               ‘‘म्हणून सुंदर जंगल, धनधान्ययुक्त देशात (धनुर्दुर्गम) धनुर्धारी पुरूषांच्या , गहन (महीदुर्गम) मातीने बनविलेल्या, (अब्दुर्गम्) पाण्याने वेढलेल्या (वार्क्षम्) चोहीकडून धनदाट वृक्ष असलेल्या (नृदुर्गम्) चोहीबाजूंनी सेना असेल अशा (गिरिदुर्गम्) चोहीकडून डोंगर व मध्ये किल्ला बनवून त्यामध्ये नगर बसवावे .’’ (स.प्र. १४८)

अनुशीलन - कौटिलीय अर्थशास्त्रात चार प्रकारचे दुर्ग -कौटिल्यांनी आपल्या अर्थशास्त्रात केवळ चार प्रकारच्या दुर्गांचा उल्लेख केला आहे - (१) औदक = जलदुर्ग, (२) पार्वत = गिरिदुर्ग, (३) धान्वन = धन्वदुर्ग (४) वनदुर्ग = वृक्षदुर्ग . ||७०||


एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः ।
शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विधीयते || ७४ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ७४/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक १११

भावार्थ :-और नगर के चारों ओर (प्रकार) प्रकोट बनावे, क्योंकि उस में स्थित हुआ एक वीर धनुर्धारी शस्त्रयुक्त पुरुष सौ के साथ और सौ दश हजार के साथ युद्ध कर सकते हैं इसलिये अवश्य दुर्ग का बनाना उचित है |

मराठी भावार्थ :- (प्राकारस्थ:) नगराच्या चारीबाजूंनी (सर्व बाजूंनी) प्राकार उ प्रकोट तटबंदी करावी, कारण त्यात स्थित असणारा (एक: धनुर्धर:) एक वीर धनुर्धारी पुरूष (शतम्) शंभरांबरोबर, आणि (शतं दशसहस्त्राणि) शंभर, दहाहाजारांबरोबर (योधयति) युद्ध करू शकतात, (तस्मात् दुर्गं विधीयते) म्हणून आवश्यक असे किल्ले बांधणे उचित होय ||७४||

तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद्गृहं आत्मनः ।
गुप्तं सर्वर्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम् || ७६ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ७६/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ११७

भावार्थ :-उस के मध्य में जल वृक्ष पुष्पादिक सब प्रकार से रक्षित सब ऋतुओं में सुखकारक श्वेतवर्ण अपने लिये घर जिस में सब राजकार्य्य का निर्वाह हो वैसा बनवावे |

मराठी भावार्थ :- (तस्यममध्ये) त्याच्या मध्यभागी (जल - वृक्ष समन्वितम्) पाणी, फुलझाडे, वृक्ष (गुप्तम्) सर्व प्रकारे सुरक्षित (सर्वं ऋतुकम्) सर्व ऋतुंमध्ये सुखकारक (शुभ्रम) पांढरे (आत्मन: गृहम्) आपल्यांसाठी घर (सुपर्याप्तम्) ज्यामधून राज्यकारभार चालविता येईल असे (कारयेत्) बांधावे ||७६||

ग्रामदोषान्समुत्पन्नान्ग्रामिकः शनकैः स्वयम् ।
शंसेद्ग्रामदशेशाय दशेशो विंशतीशिने || ११६ || मनू.अध्याय ७ श्लोक ११६/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक २२२

भावार्थ :-इसी प्रकार प्रबन्ध करे और आज्ञा देवे कि वह एक-एक ग्रामों का पति ग्रामों में नित्यप्रति जो-जो दोष उत्पन्न हों उन-उन को गुप्तता से दश ग्राम के पति को विदित कर दे और वह दश ग्रामाधिपति उसी प्रकार वीस ग्राम के स्वामी को दश ग्रामों का वर्त्तमान नित्यप्रति जना देवे |

मराठी भावार्थ :-अशाच प्रकारे व्यवस्था कारावी आणि आज्ञा द्यावी की (ग्रामिका) त्या एकेका गावाच्या प्रमुखाने (ग्रामदोषान् समुत्पन्नान्) गावामध्ये सतत जे जे दोष उत्पन्न होतील, ते ते (शनकै: स्वयम्) गुप्तपणे (ग्रामदशेशाय ) दहा गावांच्या पतीस (प्रमुखास) (शंसेत्) कळवावेत, आणि (दशेश:) त्या दशग्रामाधिपतीने म्हणजे दहा गावांच्या प्रमुखाने त्याचप्रकारे (विंशति ईशिने ) वीस गावांच्या स्वामीस दहा गावाच वर्तमान (स्थिती) नित्यप्रती कळवावो ||११६||

राज्यासंबंधी मंत्रणेची (विचार - विनिमयाची )ठिकाणे 

गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रसादं वा रहोगतः ।
अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः || १४७ || मनू.अध्याय ७ श्लोक १४७/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक २४३

भावार्थ :-पश्चात् उसके साथ घूमने को चला जाये पर्वत की शिखर अथवा एकान्त घर वा जंगल जिसमें एक श्लाका भी न हो वैसे एकान्त स्थान में बैठकर विरूद्ध भावना को छोड़ मन्त्री के साथ विचार करे ।

मराठी भावार्थ :-  (गत:) नंतर त्याच्यासोबत फिरावयास जावे (गिरिपृष्ठे वा रह: प्रासादं) पर्वतमाथ्यावर अथवा एकांत घरात (वा) वा (अरण्ये नि:शलाके) अरण्यात, जेथे एक शलाकाही नाही अशा एकांत स्थळी (समारूह्य)बसून (अविभावित:) विरूद्ध भावना सोडून (मन्त्रयेत्) मंत्र्यासोबत विचारविनिमय करावा ।। १४७।।

अनुशीलन -१. ‘नि: शलाके अरण्ये ’ याचा अभिप्राय - येथे ‘नि: शलाके अरण्ये ’ याचा उपयोग लाक्षणिक किंवा म्हणीच्या रूपात केला आहे; ज्याचा अभिप्राय आहे - असे स्थान जेथे तृणासदृश लहानातलहान प्राणी किंवा इतर गुप्तखलबतभेदक वस्तू (वा प्राण्याच्या) उपस्थितीची संभावना असणार नाही.

२. मंत्रणास्थळासंबंधी कौटिल्यांचे विचार - आचार्य कौटिल्यांनी आपल्या अर्थशास्त्रात ‘नि:शलाकापण’ याचा भाव प्रकारांतराने सकारण व्यक्त करीत मंत्रणास्थानाविषयी लिहिले आहे - ‘‘ तदुद्देश: संवृत्त: कथानामनि: स्त्रावी पक्षिभिरप्यनालोक्य: स्यात् श्रूयते हि शुकसारिकाभिर्मन्त्रो भिन्न: श्वभिरन्यैश्च तिर्यग्योनिभि: । ’’ (प्र. २०।१४).

= मंत्रणास्थळ अत्यंत सुरक्षित आणि गोपनीय असले पाहिजे. असे, जेथे पक्षीसुद्धा डोकावू शकणार नाहीत (मग माणसांबद्दल तर प्रश्नच नाही ). कारण (असे ऐकिवात आहे की पुरातनकाळी कुण्या राजाची गुप्तयंत्रणा पोपटाकडून आणि मैनेकडून बाहेर प्रकट केली गेली होती. अशाच प्रकारे कुत्र्याकडून आणि इतर पशु- पक्ष्यांकडूनही याविषयी ऐकिवात येते..||१४७||


धर्म ,काम, अर्थ, यासंबंधी बाबींवर चिंतन करावे -


मध्यंदिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः ।
चिन्तयेद्धर्मकामार्थान्सार्धं तैरेक एव वा || १५१ || मनू.अध्याय ७ श्लोक १५१/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक २४४

भावार्थ :-दोपहर दिन अथवा आधी रात्रि के समय निश्चिन्त तथा शान्ति से मन्त्रियों के साथ या स्वयं (अकेला) ही कर्म और अर्थ का विचार करें।

मराठी भावार्थ :- (मध्यंदिने , दुपारच्या वेळी (वा) अथवा ( विश्रान्त: विगतक्लम:) विश्रांती घेऊन, थकवा वा आळसरहित होऊन स्वस्थ व प्रसन्न शरीर आणि मनाने ( अर्धरात्र) रात्री कोणत्याही वेळी (धर्म -काम - अर्थात्) धर्म काम व अर्थांसंबंधी बाबींचा (ते: सार्धम्) त्या मंत्र्यांसोबत (वा) अथवा परिस्थितीविशेषमध्ये (एक एव) एकटयानेच (चिन्तयेत्) विचार करावा (चित्तयेत् क्रियेचा अन्वय १५८ पर्यंत लागू आहे ) ।। १५१।।

अनुशीलन -१. राजाद्वारे धर्म, काम, अर्थ यावर चिंतन - राजाने प्रसन्न मनाने धर्म, काम अर्थ यासंबंधी बाबींवर देश, काळ, कार्य पाहून एकटयाने अथवा इतर मंत्र्यांसयोबत दररोज विचार केला पाहिजे. कौटिल्यांनीही म्हटले आहे - ‘‘ देश - काल - कार्यवशेन, त्वेकेन सह,द्वाभ्याम्, एको वा यथासामर्थ्य मन्त्रयेत्। ’’ (प्र . १०। अ. १४)
२. धर्म काम, अर्थ, यांच्या स्वरूपावर विस्तृत विवेचन ७।२६ वर पाहावे .
३.‘अर्ध’ शब्दाचा येथे १५१ मध्ये ‘एक भाग’ या अर्थाने उपयोग केला आहे. संप्रविभाग एक द्वितीयाश अर्थाने नाही; जसे ‘नगरार्ध’ चा ‘नगराचा एकभाग ’ आहे. अशाच प्रकारे येथे ‘रात्रीचा कोणताही भाग’ अर्थ आहे. | ||१५१||

धर्म, अर्थ ,काम, यात विरोध दूर करावा -

परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपार्जनम् ।
कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् || १५२ || मनू.अध्याय ७ श्लोक १५२/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक २४५

भावार्थ :-और उस धर्म - अर्थ - काम में परस्परविरोध आ पड़ने पर उसे दूर करना और उनमें अभिवृद्धि करना और कन्याओं और कुमारों का गुरूकुलों में भेजना और उनकी सुरक्षा तथा विवाह का भी विचार करे

टिप्पणी :
‘‘राजा को योग्य है कि सब कन्या और लड़कों को उक्त समय से उक्त समय तक ब्रह्मचर्य में रख के विद्वान् कराना । जो कोई इस आज्ञा को न माने तो उसके माता पिता को दण्ड देना अर्थात् राजा की आज्ञा से आठ वर्ष के पश्चात् लड़का वा लड़की किसी के घर मंथ न रहने पावें । किन्तु आचार्यकुल में रहे जब तक समावत्र्तन का समय न आवे तब तक विवाह न होने पावे ।’’ (स० प्र० तृतीय समु०)

(१) धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष, इनमें यदि कभी परस्पर-विरुद्धता द्ष्टिगोचर होती हो, तो उस विरोध का परिहार करते हुए उनका सम्यक्तया संपादन करना, और राजा व प्रजा की लड़कियों को ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्या-ग्रहणार्थ कन्या-गुरुकुलों में देना, और लड़कों को बालक-गुरुकुलों में रखना।१

टिप्पणी :
इससे लड़के-लड़कियों की अबाधित शिक्षा का राजनियम प्रदर्शित किया गया है। अतः, जो माता पिता इस नियम को भंग करने वाले होंगे, वे दण्डनीय समझे जावेंगे। (देखो सं० स० ३ का प्रारम्भ और अन्त)। इसी अध्याय के ५८वें श्लोक में यह भी दर्शाया जा चुका है कि ब्रह्म-निधि (विद्यारूपी कोष) में धन व्यय करना राजा का कर्तव्य है। अतः, शिक्षा-व्यय राज्य की ओर से किया जावेगा। गौतम बुद्ध के सुत्तनिपात में भी ब्राह्मण-धर्म बतलाते हुए ‘ब्रह्मं निधिमपालयु से इसी ब्रह्मनिधि का निर्देश किया है।

मराठी भावार्थ :- (च) आणि (तेषां परस्परविरूद्धनां समुपार्जनम्) त्या धर्म, अर्थ, काम यांच्यात परस्परविरोध आल्यास तो दूर करणे आणि त्यांच्यात अभिवृद्धीकरणे (च) आणि (कन्यानां कुमाराणां सम्प्रदानंच रक्षणम्) मुलींना व मुलांना गुरूकुलांमध्ये पाठविणे आणि त्यांचे संरक्षण व विवाह व्यवस्था यांचाही विचार करावा ।। १५२।।
      ‘‘ राजास हे योग्य आहे की सर्व मुलींना व मुलांना पूर्वी सांगितल्याप्रमाणे या वेळेपासून त्या वेळेपर्यंत ब्रह्मचर्यात ठेवून विदुषी - विद्वान करावे. जो कोणीे ही आज्ञा पाळणार नाही, त्याच्या आईबापास दंड - शिक्षा, द्यावी, म्हणजे राजाच्या आज्ञेने वयाच्या आठव्या वर्षांनंतर मुलगा व मुलगी घरी राहू देऊ नये, पण आचार्यकुलात राहात असताना जोपर्यंत समावर्तनाची वेळ येत नाही. तोपर्यंत त्यांचा विवाह होता कामा नये. ’’ ||१५२||

दूतसंप्रेषण आणि गुप्तचरांच्या आचरणावर दृष्टी -

दूतसंप्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च ।
अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम्  || १५३ || मनू.अध्याय ७ श्लोक १५३/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक २४६

भावार्थ :-और दूतों को इधर – उधर भेजना उसी प्रकार अन्य शेष रहे कार्यों को पूर्ण करना तथा अन्तः पुर महल के आन्तरिक आचरण एवं स्थिति और नियुक्त गुप्तचरों के आचरण एवं चेष्टाएं, इन पर भी ध्यान रखे, विचार करे ।

मराठी भावार्थ :- (च) आणि (दूतसंप्रेषणम्) दूतांना कामे नेमून त्यासाठी पाठविणे (तथैव कार्यशेषम्) त्याचप्रकारे इतर उरलेली कामे पूर्ण करणे (च) तसेच (अन्त: पुर - प्रचारम्) अंत:पुर महालांतीत अंतर्गत आचरण - घटना आणि परिस्थिती (च) आणि (प्रणिधोनां चेष्टितम्) नियुक्त गुप्तचरांच्या आचरणावर व परिस्थितीवर लक्ष ठेवणे, यावर विचार करावा ||१५३||

अष्टविध कर्म आदीवर चिंतन -

कृत्स्नं चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्गं च तत्त्वतः ।
अनुरागापरागौ च प्रचारं मण्डलस्य च || १५४ || मनू.अध्याय ७ श्लोक १५४/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक २४७

भावार्थ :-और सम्पूर्ण अष्टविध कर्म तथा पंच्चवर्गंदूतों की व्यवस्था अनुराग - लगाव और अपराग स्नेह का अभाव - द्वेष तथा राज्यमण्डल की स्थिति एवं आचरण इन बातों पर ठीक ठीक चिन्तन करे ।

(1) आठ कर्म तथा सिद्धान्त से (2) पंच वर्ग को भी विचारें दूसरे राजाओं और अपने मन्त्रियों की प्रीति व शत्रुता को जान कर उसका उपाय करें।

टिप्पणी :
आठ कर्म यह हैं - (1) प्रजा से कर लेना, (2) कर्मचारियों को उचित समय पर वेतन देना, (3) धर्म व संसार के करने योग्य कर्मों को करना, (4) त्याग योग्य कर्मों का त्यागना तथा प्रत्येक कार्य के लिये मन्त्रियों को आज्ञा देना, (5) व्यवहार देखना, (6) जो व्यवहार विरुद्ध करे उससे शास्त्रानुसार अर्थदण्ड लेना, (7) जिन लोगों ने अपने दान, आश्रम, धर्म को परित्याग कर दिया है उनको फिर दान, आश्रम, धर्म को ठीक व उचित रीति पर कराने के लिये प्रायश्चित कराना (8) यदि ¬प्रायश्चित द्वारा पतित शुद्ध न किये जावें तो एक दिन सब मनुष्य दान, आश्रम, धर्म से पतित होकर अनाचारी हो जावेंगे अतएव राजा को पतितोद्वार पर अधिक ध्यान देना चाहिये। 2-पंच वर्ग यह हैं - 1. जो पुरुष दूसरों की हार्दिक बातों का ज्ञाता, स्पष्ट वक्ता, कपटी है यदि ऐसा पुरुष जीविकार्य आवे तो उसकी योग्यातानुसार धन वस्त्रादि देकर एकान्त में उससे कहे


मराठी भावार्थ :-(च) आणि (कस्त्नं अष्टविधं कर्म) संपूर्ण अष्टविध कर्म (च) तसेच (पञ्चवर्गम्) पंचवर्गाची व्यवस्था( अनुराग: माया - प्रेम आणि आचरण: स्नेहाचा अभाव द्वेष (च) तसेच (मण्डलस्य प्रचारम्) मंडळाची परिस्थिती व आचरण (७।१५५-१५७ मध्ये वक्ष्यमाण) (तत्त्वत:) या गोष्टींवर ठीकठीक चिंतन करावे ।। १५४।।

अनुशीलन - १. अष्टविध कर्मांच्या विवादाचे समाधान -

    मनूंनी या श्लोकात राजाच्या अष्टविध कर्मांची गणना न करता फक्त ‘‘ कृत्स्नं च आष्टविंध कर्म ’’ म्हणून फक्त संकेत केला आहे. भाष्यकरांनी यावरील भाष्यात आपापले मत देऊन राजाची अष्टविध कर्मे सांगितली आहेत. या कर्मांत मतभेद होत असल्यामुळे ही बाब विवादास्पद बनली आणि नंतरच्या व्याख्याकारांनी - भाष्य- कारांनी आपल्या पूर्वीच्या भाष्यकारांचे मत देऊन या श्लोकाची व्याख्या - स्पष्टीकरण करून ते पुढे चालू लागतात, (वादात खोलात शिरत नाहीत ).

    येथे विचार करण्याची गोष्ट अशी की श्लोक ७। १४५- २२६ पर्यंत मनूंनी राजाच्या दिनचर्येअंतर्गत गुप्तमंत्रणा किंवा मंत्रिपरिषदेशी मंत्रणा करण्यायोग्य विषयांचा उल्लेख केला आहे (७।१४७-२१५). याप्रसंगात काही गोष्टी स्पष्टपणें सांगितल्या आहेत. या श्लोकात केवळ संख्येचा उल्लेख केला आहे. याचा अर्थ लावताना आपण दोन गोष्टींवर अवधान देऊ -(१) मंत्रणेमध्ये परिगणना केलेल्या गोष्टींहून भिन्न अष्टविध गोष्टी असल्या पाहिजेत, कारण एकाच ठिकाणी पुनरूक्ती असणे बुद्धिसंगत ठरत नाही. (२) ‘कृत्स्नम्’
विशेष अर्थ देऊन असा संकेत करते की ही अष्टविध कर्मेच राजाचे समग्र कर्तव्य आहे. यांच्या आधारावर मनन केल्यास मनुस्मृतीमध्येच अष्टविध कर्मांचा उल्लेख सापडेल.

    ७।३६ ते १४४ पर्यंतच्या श्लोकांमध्ये मनूंनी ‘भृंत्योंसहित राजाचे समग्र कर्तवय’ चे वर्णन केले आहे. दुस-या शब्दात निष्कर्षरूपात ती राजाची जीवनचर्या आहे, म्हणून असे म्हणता येईल की तीच राजाची संपूर्ण अष्टविध कर्मे आहेत. जीवनचर्येच्या प्रसंगात अगोदर परिगणना आल्यामुळे येथे दिनचर्येच्या प्रसंगात त्यांची परिगणना केली नाही. 

अशाप्रकारे राजची अष्टविध कर्मे मनुस्मृतीबाहेर शोधण्याची आवश्यकता उरत नाही. ती खालील प्रकारे आहेत -
(क) राजाची मनुप्रोक्त अष्टविध कर्मे -

(१) आचार्य, ऋत्विक आदी वेदांच्या विद्वानांची संगत आणि त्यांच्याकडून शिक्षण घेणे (७।३७,३९,४३) 
(२) इंद्रियजय व त्या आधारे व्यसनांपासून बचाव (७।४४-५३).
(३) मंत्र्यांची, अमात्यांची, दूतांची, अध्यक्षा आदींची नियुक्ती आणि त्यांच्याकरवी कार्यसंपादन (७।५४-६८) 
(४) दुर्ग निर्माण - किल्ले बांधणी (७।-६९ -७७). 
(५) युद्धासाठी प्रशिक्षित
व सिद्ध राहाणे (७८।८७-१०६) 
(६) अपराध्यांना न्यायपूर्वक शिक्षा देणे व अशारीतीने प्रजेस शांती, समुद्धी व संरक्षण देणे (७।१०७-१२४) ,
(७) वेतन आदी देणे (७।१२५- १२६), 
(८) कर संग्रह कर वसूल करणे (७।१२७-१४२).

(ख) ‘उशनस् स्मृती’ त राजाची आठ कर्मे अशी सांगितली आहेत -

‘‘ आदाने च विसर्गे च प्रैषनिषेधयो : ।
पञ्चमे चार्थवचने व्यवहारस्य चेक्षणे ।
दण्डशुद्धयोस्तथा युक्तस्तेनाष्टगतिको नृप: ।।

राजाची अष्टविध कर्मे अशी आहेत - 
(१) आदान - कर वसूल करणे
(२) विसर्ग - कर्मचा-यांना वेतन देणे 
(३) प्रैष - मंत्री, राजदूत आदींना कामावर पाठविणे - काम नेमून देणे 
(४) निषेध - विरोधी कामे न करणे 
(५) अर्थवचन - राजाज्ञांचे पालन करविणे, 
(६)व्यवहार पाहाणे - मुकदमे, न्यायप्रविष्ट प्रकरणे - निकाली काढणे
(७) दंड वसूल करणे, शिक्षा देणे,
(८) शुद्धी - अपराध्यांना पाप्यांना, प्रायश्चित आदीने सुधारणे.

(ग) मेधातिथींनी अष्टविध कर्मे खालील प्रकारे मानली आहेत - 
(१) न झालेली कामे सुरू करणे, 
(२) सुरू केलेली कामे पूर्ण करणे,
(३) पूर्ण केलेल्या कामाचा प्रसार करणे
(४) कर्मांच्या फळाचा संग्रह करणे, 
(५) साम
(६) दाम ,
(७) दंड 
(८) भेद, किंवा 
(१)व्यापाराचा मार्ग 
(२) पाण्यात पूल बांधणे 
(३) किल्ले बांधणे 
(४) झालेल्या कामाच्या संस्काराचा निर्णय
(५) हत्ती पकडणे 
(६) अन्न प्राप्ती करणे, 
(७) शून्यस्थानी प्रवेश करणे,
(८) लाकडांची वने कापविणे.

२. ‘‘ पञ्चवर्ग ’’ याचा अभिप्राय -

(क) अर्थशास्त्रात आचार्य कौटिल्यांनी मंत्रणेच्या प्रसंगी ‘पञ्चाड्.गमन्त्र ’ नावाने,

   विचार करण्यासारख्या पाच गोष्टींचा उल्लेख केला आहे. असे दिसते की अशा प्रसंगी परंपरेने चालत आलेल्या बाबीच पंचवर्गात अभिप्रेत आहेत. येथे मनूनीही मंत्रणेच्या प्रसंगात पंचवर्गाचा उल्लेख केला आहे. पंच - अंग असे - 
(१) कामे सुरू करण्याचे उपाय
(२) पुरूष आणि द्रव्यसंपत्ती,
(३) देश - काळाचा विभाग 
(४) विघ्नांचा प्रतिकार करणे
(५) कार्यसिद्धी . (‘‘ कर्मणामारम्भोपाय: , पुरूषद्रव्यसंपत्, देशकालाविभाग:, विनिपात)प्रतीकार: कार्यसिद्धि : , इति पञ्चाड्.गो मन्त्र : ’’ (प्रक. १० । अ.१४).

(ख) कुल्लूकभट्टांनी खालील पाच प्रकारच्या गुप्तचरांच्या व्यवस्थेस ‘पञ्चवर्ग ’ म्हटले आहे. पण या मान्यतेत एक - दोन अडचणी येतात . 
(१) १५३ व्या श्लोकात समग्ररूपाने गुप्तचरांच्या कार्याच्या व्यवस्थेचे कथन आहे.
(२) परंपरागत रूपाने शास्त्रांमध्ये केवळ पाचच नाही, तर प्रमुख गुप्तचरांचे इतर वर्गही आहेत. म्हणून, कौटिल्यांनी सांगितलेले ‘पंचांग’ येथे अधिक संगत वाटते. 

कुल्लूकांद्वारे वर्णिलेले पाच प्रकारचे गुप्तचर खालीलप्रमाणे आहेत -

(१) कापटिक (लांडया - लबाडीच्या व्यवहाराद्वारे भेद जाणणारा ) 
(२) उदास्थित (संन्याशाच्या वा साधूच्या वेशात महान व्यक्तीच्या रूपात आपली प्रसिद्धी करून, बैठक मारून त्याद्वारे गुप्त भेद जाणून कळविणारा) 
(३) कृषक (शेतक-याचे सोंग घेऊन गुप्तचरी करणारा) 
(४) वाणिजक (व्यापा-याचे सोंग घेऊन गुप्त माहिती काढणारा ) 
(५) तापस व्यंजक (तपस्वाचे सोंग घेणारा).

३. अनुराग व अपराग - आपल्या व शत्रूराजाच्या प्रजेमध्ये तसेच इतर राजांमध्ये अनुराग उ राजाशी स्नेह ठेवणारा आहे. आणि कोण अपराग उ द्वेष करणार आहे, यावर विचार करणे. याच दोन तत्त्वांचे कौटिल्यांनी अर्थशास्त्रात (प्रक्र . ८-९ मध्ये) कृत्य आणि अकृत्य पक्षाच्या रूपात वर्णन केले आहे. कृत्य म्हणजे ज्यांना कसले तरी प्रलोभन दाखवून राजापासून तोडले - फोडले जाऊ शकते, अर्थात असंतुष्ट, अपरागी. हे प्रामुख्याने क्रुद्ध,लुब्ध ,भीत व अवमानित असे चार प्रकारचे असतात (७।६७ ची समीक्षा पाहावी ). अकृत्य ज्यांना फोडले जाऊ शकत नाही. ; संतुष्ट प्रजानन, अनुरागी , स्वप्रजानन व शत्रुप्रजाजनाप्रमाणे इतर राजांच्या स्नेहाचा व द्वेषाचाही विचार राजाने करावा .

४. मण्डल- (मंडळ) १५५ ते १५७ श्लोकांत वर्णिलेल्या प्रकृतींना ‘मण्डल’ म्हणतात. राजाने या सर्वांच्या हालचाली, स्थिती, आचरण यांवर गंभीरपणे विचार केला पाहिजे. अर्थशास्त्र (प्र. ९७ ।अ.३२ ) मध्ये आचार्य कौटिल्यांनी या बाहत्तर प्रकृतींच्या मंडळास चार प्रकृतिमंडळात विभागले आहे; त्याचे विवरण १५७ वर केले आहे.||१५४||

दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वयंभुवोऽब्रवीत् ।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् || १२४ || मनू.अध्याय ८ श्लोक १२४/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४६६

भावार्थ :-क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन तीनों वर्णों के दण्ड के दश स्थान स्वयम्भू अर्थात् सांकल्पिक सृष्टि के उत्पन्न ऋषि के बेटे मनुजी ने कहे। ब्राह्मण तो शारीरिक दण्ड बिना पाये चला जाये।

टिप्पणी :
स्वयम्भू के अर्थ यह है कि जो बिना माता पिता के उत्पन्न हुआ हो। क्योंकि आदि सृष्टि में ऋषि लोग परमात्मा के संकल्प से उत्पन्न होते हैं अतएव वह स्वयम्भू कहलाते हैं वेदों के ज्ञान को वही लोग प्रचार करते हैं। तथा धर्मशास्त्र भी वही लोग स्थिर व नियत करते हैं।

मराठी भावार्थ :- ||१२४||


उपस्थं उदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।
चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च  || १२५ || मनू.अध्याय ८ श्लोक १२५/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४६७

भावार्थ :-उपस्थ (मूत्रस्थान), उदर (पेट), जिह्वा, दोनों हाथ, दोनों पाँव, कान, दोनों आँखें, नाक, धन, शरीर यह दश दण्ड स्थान हैं।

मराठी भावार्थ :- ||१२५||


अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः ।
निरोधनेन बन्धेन विविधेन वधेन च || ३१० || मनू.अध्याय ८ श्लोक ३१०/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४६५

भावार्थ :- पापियों को कारागार में रखने, बेड़ी आदि डालकर बाँधने तथा विविध प्रकार का शारीरिक व आर्थिक दण्ड देकर इन तीन उपायों से यत्नपूर्वक उनका निग्रह करें अर्थात् उक्त तीन उपायों द्वारा पापी पुरुषों का पाप छुड़ावें।

मराठी भावार्थ :- यासाठी राजाने (निरोधनेन) निरोध: कैदेत टाकणे (बन्धेन) बंधन, हातकडया, बेडया ठोकणे (च) आणि (विविधेन बधेन) निरनिराळया प्रकारच्या शारीरिक शिक्षा उदा. फटकेमारणे, अंगच्छेदन अवयव कापणे, तोडणे इत्यादी (त्रिभि: न्यायै:) अशा तीन प्रकारच्या उपायांनी (प्रयत्नत:) प्रयत्नपूर्वक (अधार्मिकं निगृह्णीयात् )चोर आदी दुष्टांना व अपराध्यांना नियंत्रणाखाली ठेवावे  ||३१०||

पिताचार्यः सुहृन्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः ।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति || ३३५ || मनू.अध्याय ८ श्लोक ३३५/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४७९

भावार्थ :- पिता, आचार्य, सुहृदय माता, स्त्री, पुत्र और पुरोहित इनमें से जो स्वधर्म में स्थित न हों वह दण्डनीय हैं अर्थात् यह भी दण्ड योग्य हैं। राजा के समीप अपराधी होने की दशा में सब मनुष्य दंड देने योग्य हैं।

चाहे पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र और पुरोहित क्यों न हो जो स्वधर्म में स्थित नहीं रहता वह राजा का अदण्डय नहीं होता अर्थात् जब राजा न्यायासन पर बैठ न्याय करे तब किसी का पक्षपात न करे किन्तु यथोचित दण्ड देवे । (स० प्र० षष्ठ समु०)

मराठी भावार्थ :- (पिता आचार्य: सुहृत् माता भार्या पुत्र: पुरोहित:) मग तो पिता , आचार्य, मित्र, मात, स्री , पुत्र आणि पुरोहित का असेना (य: स्वधर्मे न तिष्ठति) जो स्वधर्मात स्थित नाही, (स्थिर नाही) (राज्ञ: अदण्डय: नाम न) तो राजाचा अदंडय असत नाही, म्हणजे जेव्हा राजा न्यायासनावर बसेल व न्याय करील तेव्हा कोणाचाही पक्षपात (राजाने) त्याने करू नये, तर यथोचित शिक्षा करावी ||३३५||

मौण्ड्यं प्राणान्तिकं दण्डो ब्राह्मणस्य विधीयते ।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत्  || ३७९ || मनू.अध्याय ८ श्लोक ३७९/ बुधभूषण = अध्याय २ श्लोक ४६८

भावार्थ :- वध के स्थान पर ब्राह्मण का मूँड मुडाना ही दण्ड है तथा अन्य वर्णों का वध करना चाहिये।

मराठी भावार्थ :-  ||३७९||


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नागराज आर्य
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