ईश्वर

ईश्वर


१) ईश्वर किसे कहते है ?
उत्तर = एक ऐसी वस्तु जो सब जगह विद्यमान है , चेतन है (conscious), निराकार है (no shape and size) अनंतज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, न्याय दया आदि गुण कर्म स्वभाव से युक्त है उसका नाम ईश्वर है |

२) ईश्वर का कोई रूप, रंग, भार, आकर, आदि है या नहीं ?
उत्तर= ईश्वर में ये गुण नहीं होते | इसी कारन ईश्वर को निर्गुण भी कहते है |

३) संसार को ईश्वर बनाता है या जीव बनाते हैं या अपने आप बन जाता है ?
उत्तर = ईश्वर बनाता है | जीवों के पास इतना ज्ञान व सामर्थ्य नहीं है की वे संसार को बना सकें | प्रकृति ज्ञानरहित तथा स्वयं क्रिया रहित होने से स्वयं संसार के रूप में नहीं आ सकती |

४) ईश्वर से हमारे क्या क्या सम्बन्ध हैं ?
उत्तर = ईश्वर हमारा माता,पिता,गुरु, राजा, स्वामी, उपास्य आदि है | और हम उसके पुत्र, शिष्य , प्रजा सेवक, उपासक आदि है |

५) ईश्वर जीवों से क्या चाहता है ?
उत्तर = ईश्वर जीवों से चाहता है की जीव उसकी आज्ञा का पालन करके संसार में सुखी रहें व मुक्तिपद को प्राप्त करें |

६) ईश्वर की आज्ञा क्या है, यह कैसे पता चलता है ?
उत्तर = वेदों के पढने से और ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों को जानने से उसकी आज्ञाओं का पता लगा सकते हैं |

७) ईश्वर और आत्मा में क्या समानता है ?
उत्तर = ईश्वर और आत्मा में यह समता है की दोनों चेतन है पवित्र अविनाशी अनादि है , निराकार हैं |

८) ईश्वर और आत्मा में क्या भेद है ?
उत्तर = ईश्वर सर्वज्ञ है , आत्मा अल्पज्ञ हैं | ईश्वर के पास उत्कृष्ट सुख है आत्मा के पास सुख नहीं है वह सुख लेने के लिए ईश्वर के पास या संसार के पदार्थों में जाता है |

९) ईश्वर का मुख्य व निज नाम क्या है ?
उत्तर = 'ओ३म' यह परमात्मा का प्रधान निज नाम है | जैसे वेद में भी आया है " ओ३म क्रतो स्मर" |

१०) ईश्वर के मुख्य कार्य कौन कौन से है ?
उत्तर = ईश्वर के मुख्य रूप से ५ कार्य हैं -
१) सृष्टि को बनाना,
२) पालन करना,
३) संहार करना,
४) जीवों के कर्मो का फल देना,
५) वेदों का ज्ञान देना |

११) प्रलय में ईश्वर कुछ करता है या सो जाता है ?
उत्तर = प्रलय में ईश्वर मुक्तात्माओं को आनन्द भूगाता है |

१२) ईश्वर का ज्ञान सदा एक सा रहता है या घटता बढ़ता है ?
उत्तर = ईश्वर का ज्ञान सदा एकरस रहता है अर्थात घटता बढ़ता नहीं है तथा वह असत्य भी नहीं होता |

१३) संसार को किसने धारण किया हुवा है ?
उत्तर = ईश्वर ने अपने समर्थ से सब लोक-लोकान्तरों को ( संसार को ) धारण कर रखा है |

१४) ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में कोई अन्तर है या नहीं ?
उत्तर = ईश्वर के सुख व सांसारिक पदार्थों के सुख में अन्तर है | ईश्वर का आनन्द स्थायी व पूर्ण तृप्ति देने वाला है जबकि सांसारिक पदार्थों का सुख क्षणिक व दुःख मिश्रित है |

१५) ईश्वर व जीवों के बीच कोई दुरी है या नहीं ?
उत्तर = काल स्थान की दृष्टी से जीव, ईश्वर से दूर नहीं है | ईश्वर हर समय, हर स्थान पर उनके साथ रहता है | परन्तु ज्ञान की दृष्टी से जीव ईश्वर से दूर हो जाते है | जो ईश्वर को नहीं जानते, मानते व उसकी भक्ति नहीं करते वे जीव, ईश्वर से दूर हैं |

१६) ईश्वर की क्या विशेषता है ?
उत्तर = ईश्वर सदा अपने आनंद में मग्न रहता है । ईश्वर में कोई  न्यूनता, कोई दोष नहीं है । उसे किसी भौतिक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती ।

१७) ईश्वर किस किस  का स्वामी है ?
उत्तर = ईश्वर प्रकृति, जीवों, संसार व मोक्ष का स्वामी है ।

१८) क्या जीव अपने कर्मो का फल पूर्ण रूप से स्वयं ले सकते हैं ?
उत्तर = नहीं, कर्मों का फल ईश्वर के अधीन है । वह अपनी व्यवस्था से कर्मफल देता है ।

१९) क्या भक्त अपने सामर्थ्य से ईश्वर का दर्शन ( अनुभूति ) कर सकता है ?
उत्तर= नहीं, जबतक  ईश्वर से ज्ञान विज्ञानं न मिले व ईश्वर की कृपा न हो तब तक भक्त उसका दर्शन ( अनुभूति ) नहीं कर सकता ।

२०) जब परमेश्वर जन्म नहीं लेता तब निर्गुण व जब जन्म  तब सगुन कहलाता है । क्या यह बात ठीक है ?
उत्तर = नहीं, सगुन व निर्गुण का अर्थ  ही है । सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता आदि गुणों से  सहित होने से उसे सगुण व जड़त्व ,मूर्खत्व , राग-द्वेष आदि गुणों से रहित होने से ईश्वर को निर्गुण कहते है ।

२१) ईश्वर को जानने के पश्चात  योगी को क्या अनुभूति होती है ?
उत्तर = ईश्वर को जानने के पश्चात योगी को यह अनुभूति होती है  जो जानना था सो जान  लिया, जो पाना था सो पा लिया , अब कुछ  जानना या प्राप्त करना बाकि नहीं रहा ।

२२) मनुष्य जन्म पाकर करने योग्य सबसे महत्व पूर्ण कार्य कौन सा है ?
उत्तर = ईश्वर को समझना व उसकी अनुभिति करना ( प्रत्यक्ष करना )  पूर्ण कार्य है ।

२३) क्या ईश्वर विरक्त है ?
उत्तर = नहीं, जो प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ दे उस विरक्त कहते है ईश्वर सर्वव्यापक होने से किसी पदार्थ को नहीं छोडता इस दृष्टी से  नहीं है ।

 २४) क्या ईश्वर जीवों में  पदार्थों में राग रखता है ?
उत्तर = नहीं , राग अपने से भिन्न उत्तम पदार्थ में होता है ।  ईश्वर से कोई  भी जीव या सांसारिक पदार्थ उत्तम नहीं है ।  अतः ईश्वर किसी से भी राग नहीं रखता है ।

२५) क्या ईश्वर इस संसार के बहार भी है ?
उत्तर= हाँ , है । अपितु ईश्वर इतना महान है कि यह सारी  सृष्टि तो उसके सामने परमाणु के तुल्य भी नहीं है ।

 २६) क्या ईश्वर हमे प्रतिदिन शिक्षा देता है ?
उत्तर = जी, हाँ । जीव बुरे या अच्छे काम करने की इच्छा करता है तो अंदर से भय, लज्जा , शंका या आनन्द , उत्साह , निर्भयता प्राप्त होते है । यह अंतर्यामी ईश्वर  शिक्षा है जिससे जीव बुर व अच्छे कर्मों को जान सकता है  ।

२७) क्या संसार में ईश्वर का अभाव होता है ?
उत्तर = नहीं, संसार का तो प्रलय में आभाव हो जाता है परन्तु उस समय भी ईश्वर व जीव व प्रकृति रहते है उनका तीनो कालो में अस्तित्व रहता है ।

२८) मनुष्य संसार की हानि करते हैं तो क्या ऐसे में ईश्वर उन्हें देखकर दुःखी होता है ?
उत्तर = नहीं । परन्तु जो पापी हैं उन्हें अच्छा नहीं मानता व जो पुण्यात्मा है उन्हें अच्छा मानता है व उन्हें भय शंका  रूप में दंड देता है उन्हें उत्साह, प्रेरणा भी देता है ।

२९) ईश्वर का दर्शन कौन करते है ?
उत्तर = वेद आदि शास्त्रों के विद्वान, धर्मात्मा व योगी मनुष्य ही ईश्वर  साक्षात्कार कर सकते है ।

३०) क्या ईश्वर शरीर धारण करता या रोगी,  बूढ़ा होता है ?

उत्तर = नहीं, ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता है । न तो रोगी बूढ़ा होता है वह तो बिना शरीर  अपने सब कार्य अपने सामर्थ्य से कर सकता है ।

जीवात्मा


१) जीवात्मा  किसे कहते है ?
उत्तर =  एक ऐसी वस्तु  जो  अत्यंत  सूक्ष्म है, अत्यंत  छोटी है , एक जगह रहने वाली है, जिसमें  ज्ञान अर्थात् अनुभूति  का गुण है, जिस में  रंग  रूप  गंध भार (वजन) नहीं  है,  कभी नाश नहीं  होता,  जो सदा से है और सदा रहेगी, जो मनुष्य-पक्षी-पशु आदि  का शरीर  धारण करती है तथा कर्म करने में  स्वतंत्र  है उसे जीवात्मा  कहते हैं ।

२) जीवात्मा  के दुःखों का कारण क्या  है ?
उत्तर = जीवात्मा  के दुःखों  का कारण  मिथ्याज्ञान है ।

३) क्या जीवात्मा  स्थान  घेर सकती है ?
उत्तर = नहीं,  जीवात्मा  स्थान नहीं  घेरती । एक सुई की नोक पर विश्व की सभी जीवात्माएँ आ सकती हैं  ।

४) जीवात्मा का प्रलय मे क्या स्थिति  होती है । क्या उस समय उसमें  ज्ञान होता है ?
उत्तर = प्रलय अवस्था मे बद्ध जीवात्माएँ  मूर्च्छित  अवस्था  में  रहती है । उसमें  ज्ञान होता हे परंतु  शरीर, मन आदि साधनो के अभाव से प्रकट नहीं  होता ।

५) प्रलय काल मे  मुक्त  आत्माएं  किस अवस्था  में रहती है ?
उत्तर = प्रलय काल में  मुक्त आत्माएँ  चेतन अवस्था  मे रहती है और ईश्वर  के आनन्द में  मग्न रहती है ।

६) जीवात्मा  के पर्यायवाची  शब्द क्या क्या है ?
उत्तर = आत्मा,  जीव, इन्द्र,  पुरुष, देही, उपेन्द्र,  वेश्वानर आदि अनेक नाम वेद आदि शास्त्र  में  आये हैं  ।

७) क्या जीवात्मा अपनी इच्छा  से दुसरे शरीर  मे प्रवेश कर सकता है ?
उत्तर = नहीं  कर सकता ।

८) मुक्ती  का समय कितना है ?
उत्तर  = १ महाकल्प - ऋग्वेद  = १ मंडल २४ सूक्त  २ मन्त्र । ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष मुक्ति  का समय है ।

९) जीवात्मा  स्त्री है या पुरुष है या नपुंसक  है ?
उत्तर = जीवात्मा  तीनो भी नहीं  । ये लिंग तो शरीरों  के हैं  ।

१०) क्या जीवात्मा  ईश्वर  का अंश है ?
उत्तर  = नहीं , जीवात्मा  ईश्वर  का अंश नहीं  है । ईश्वर  अखण्ड  है उसके अंश= टुकडे नहीं  होते है ।

११) क्या जीवात्मा  का कोई भार, रुप, आकार, आदि है ?
उत्तर = नहीं  ।

१२) जीवात्मा  की मुक्ती  एक जन्म में  होती है या अनेक जन्म मे होती है ?
उत्तर  = जीवात्मा  की मुक्ती  एक जन्म मे नहीं  अपितु  अनेक जन्मो मे होती है ।

१३) क्या जीवात्मा  मुक्ती  मे जाने के बाद पुनः संसार में  वापस आता है ?
उत्तर  = जी हाँ  । जीवात्मा  मुक्ति  में  जाने का बाद पुनः  शरीर धारण करने के लिए वापस आता है ।

१४)  जीवात्मा  के लक्षण क्या है?
उत्तर  = जीवात्मा  के लक्षण इच्छा,  द्वेष, प्रयत्न,  ज्ञान, सुख, दुःख  की अनुभूति  करना है ।

१५) मेरा मन मानता नहीं,  यह कथन ठीक है ?
उत्तर  = मेरा मन मानता नहीं यह कथन ठीक नहीं है । जड़ मन को  चलाने वाला चेतन जीवात्मा  है ।

१६) क्या  जीवात्मा  कर्मो का फल स्वयं  भी ले सकता है ?
उत्तर  = हाँ । जीवात्मा  कुछ कर्मो का फल स्वयं भी ले सकता है जैसै चोरी का दण्ड  भरकर । किंतु  अपने सभी कर्मो का फल जीवात्मा  स्वयं नहीं  ले सकता है ।

१७) क्या जीवात्मा  कर्म करते हुऐ थक जाता है ?
उत्तर  = नहीं,  जीवात्मा  कर्मो को करते हुवे थकता नहीं  है अपितु  शरीर, इन्द्रियाँ  का सामर्थ्य  घट जाता है ।

१८) जीवात्मा  में  कितनी स्वाभाविक  शक्तियाँ  हैं ?
उत्तर  = २४ स्वाभाविक  शक्तियाँ हैं ।

१९) शास्त्रों में  आत्मा को जानना क्यों  आवश्यक  बताया गया है ?
उत्तर  = जीवात्मा  के  स्वरूप  को जानने से शरीर, इन्द्रिय और मन पर अधिकार  प्राप्त  हो जाता है , परिणाम स्वरुप आत्मज्ञानी  बुरे कामों  से बचकर उत्तम  कार्यों  को ही करता है ।

२०) जीवात्मा  का स्वरूप  ( गुण, कर्म, स्वभाव, लम्बाई,  चौड़ाई,  परिमाण ) क्या है ?
उत्तर = जीवात्मा  अणु स्वरूप,  निराकार,  अल्पज्ञ, अल्पशक्तिमान है, वह चेतन है और कर्म करने मे स्वतंत्र है, बाल की नोंक के दश हजारवें भाग से भी सूक्ष्म  है । यह अपनी  विषेश स्वतंत्र सत्ता  रखता है ।

२१)  जीवात्मा  शरीर  मे कहाँ रहता हे ?
उत्तर  = जीवात्मा  मुख्य  रूप से शरीर  में  स्थान विशेष जिसका नाम ह्रदय  है, वहाँ रहता है किन्तु  गौण रूप से नेत्र, कण्ठ इत्यादि  स्थानों  में  भी वह निवास करता है ।

२२) क्या, मनुष्य, पशु पक्षी , किट पतंग आदि शरीरों में जीवात्मा भिन्न भिन्न होते है या एक ही प्रकार के होते है ?
उत्तर = आत्मा तो अनेक है किन्तु हर एक आत्मा एक सामान है | मनुष्य, पशु, पक्षी आदि किट पतंग के शरीरो में भिन्न-भिन्न जीवात्माएं नहीं किन्तु एक ही प्रकार के जीवात्माएं है | शरीरों का भेद है आत्माओ का नहीं |

२३) जीवात्मा शरीर क्यों धारण करता है? कबसे कर रहा है और कब तक करेगा ?
उत्तर = जीवात्मा, अपने कर्मफल को भोगने और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए शरीर को धारण करता है संसार के प्रारम्भ से यह शरीर धारण करता आया है और जब तक मोक्ष को प्राप्त नहीं करता तब तक शरीर धारण करते रहेगा |

२४) क्या मरने के बाद जीव, भूत, प्रेत, डाकन आदि भी बनकर भटकता है ?
उत्तर = मरने के बाद जीव न तो भूत, प्रेत बनता है और न ही भटकता है | यह लोगों के अज्ञान के कारन बनी हुई मिथ्या मान्यता है |

२५) शरीर में जीवात्मा कब आता है ?
उत्तर = जब गर्भ धारणा होता है तभी जीवात्मा आ जाता है , अर्थात वह वीर्य में ही पहलेसे उपस्थित होता है , और जब रजवीर्य मिलते है तब | यह मिथ्या धारणाये है ३ रे महीने में अथवा ८ या ९ वे महीने में आता है |

२६) क्या जीव और ब्रह्म (ईश्वर) एक ही है ? अथवा क्या ' आत्मा सो परमात्मा 'एक ही है ?
उत्तर = जीव और ब्रह्म एक ही नहीं है अपितु दोनों अलग-अलग पदार्थ हैं जिनके गुण कर्म स्वभाव भिन्न-भिन्न हैं | अतः यह मान्यता ठीक नहीं गलत है |

२७) क्या जीव ईश्वर बन सकता है ?
उत्तर = जीव कभी भी ईश्वर नहीं बन सकता है |

२८) क्या जीवात्मा एक वस्तु है ?
उत्तर = हाँ , जीवात्मा एक चेतन वस्तु है, वैदिक दर्शनों में वस्तु उसको कहा गया है, जिसमे कुछ गुण कर्म, स्वभाव होते हों |

२९) क्या जीवात्मा शरीर को छोड़ने में और नए शरीर को धारण करने में स्वतंत्र है ?
उत्तर = जीवात्मा को नए शरीर को धारण करने में स्वतंत्र नहीं है अपितु ईश्वर के अधीन है | ईश्वर जब एक शरीर में जीवात्मा का भोग पूरा हो जाता है तो जीवात्मा को निकाल लेता है और उसे नया शरीर को प्रदान करता है | मनुष्य आत्मा हत्या करके शरीर छोड़ने में स्वतंत्र भी है |

३०) निराकार अणु स्वरुप वाला जीवात्मा इतने बड़े शरीरों को कैसे चलता है ?
उत्तर = जैसी बिजली बड़े=बड़े यंत्रों को चला देती है ऐसे ही निराकार होते हुए भी जीवात्मा अपनी प्रयत्न रुपी चुम्बकीय शक्ति से शरीरों को चला देता है |

३१) मनुष्य के मरने के बाद ८४ लाख योनियों में घूमने के बाद ही मनुष्य जन्म मिलता है | क्या यह मान्यता सही है ?
उत्तर = नहीं, मनुष्य के मृत्यु के बाद तुरंत अथवा कुछ जन्मों के बाद ( अपने कर्फल भोग अनुसार ) मनुष्य जन्म मिल सकता है |

३२) शरीर छोड़ने के बाद (मृत्यु पश्च्यात) कितने समय में जीवात्मा दूसरा शरीर धारण करता है ?
उत्तर = जीवात्मा शरीर छोड़ने के बाद (मृत्यु पश्च्यात) ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार कुछ पलों में शिघ्र ही दूसरे शरीर को धारण कर लेता है | यह सामान्य नियम है |

३३) क्या इस नियम का कोई अपवाद भी होता है ?
उत्तर = जी हाँ , इस नियम का अपवाद होता है | मृत्यु पश्च्यात जब जीवात्मा एक शरीर को छोड़ देता है लेकिन अगला शरीर प्राप्त करने के लिए अपने कर्मोंनुसार माता का गर्भ उपलब्ध नहीं होता है तो कुछ समय तक ईश्वर की व्यवस्था में रहता है | पश्च्यात अनुकूल माता-पिता मिलने से ईश्वर की व्यवस्थानुसार उनके यहाँ जन्म लेता है |

३४) जीवात्मा की मुक्ति क्या है और कैसे प्राप्त होती है ?
उत्तर = प्रकृति के बंधन से छूट जाने और ईश्वर के परम आनंद को प्राप्त करने का नाम मुक्ति है | यह मुक्ति वेदादि शास्त्रों में बताये गए योगाभ्यास के माध्यम से समाधी प्राप्त करके समस्त अविद्या के संस्कारों को नष्ट करके ही मिलती है |

३५) मुक्ति में जीवात्मा की क्या स्थिति होती है, वह कहाँ रहता है? बिना शरीर इन्द्रियों के कैसे चलता, खाता, पिता है ?
उत्तर = मुक्ति में जीवात्मा स्वतंत्र रूप से समस्त ब्रम्हांड में भ्रमण करता है और ईश्वर के आनंद से आनंदित रहता है तथा ईश्वर की सहायता से अपनी स्वाभाविक शक्तियों से घूमने फिरने का काम करता है | मुक्त अवस्था में जीवत्मा को शरीरधारी जीव की तरह खाने पिने की आवश्यकता नहीं होती है |

३६) जीवात्मा की सांसारिक इच्छाये कब समाप्त होती है ?
उत्तर = जब ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है और संसार के भोगों से वैराग्य हो जाता है तब जीवात्मा की संसार के भोग पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छा ये समाप्त हो जाती हैं |

३७) जीवात्मा वास्तव में क्या चाहता है ?
उत्तर = जीवात्मा पूर्ण और स्थायी सुख , शांति, निर्भयता और स्वतंत्रता  चाहता है |

३८) भोजन कौन खाता है शरीर या जीवात्मा ?
उत्तर = केवल जड़ शरीर भोजन को खा नहीं सकता और केवल चेतन जीवात्मा को भोजन की आवश्यकता नहीं है शरीर में रहता हुआ जीवात्मा मन इन्द्रियादि साधनों से कार्य लेने के लिए भोजन खाता है |

३९) एक शरीर में एक ही जीवात्मा रहता है या अनेक भी रहते हैं ?
उत्तर = एक शरीर में करता और भोक्ता एक ही जीवात्मा रहता है अनेक जीवात्माएं नहीं रहते | हाँ, दूसरे शरीर से युक्त दूसरा जीवात्मा तो किसी शरीर में रह सकता है, जैसे माँ के गर्भ में उसका बच्चा |

४०) जीवात्मा शरीर में व्यापक है या एकदिशी ( एक स्थानीय ) ?
उत्तर = शरीर में जीवात्मा एकदेशी है व्यापक नहीं, यदि व्यापक होता तो शरीर के घटने बढ़ने के कारन यह नित्य नहीं रह पायेगा |

४१) जीव की परम उन्नति, सफलता क्या है ?
उत्तर = जीवात्मा परम उन्नति आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार करके परम शांतिदायक मोक्ष को प्राप्त करना है |

४२) क्या जीवात्मा को प्राप्त होने वाले सुख दुःख अपने ही कर्मों के फल होते है ? या बिना ही कर्म किये दूसरों के कर्मों के कारन भी सुख दुःख मिलते हैं ?
उत्तर = जीवात्मा को प्राप्त होने वाले सुख दुःख अपने कर्मों के फल होते है किन्तु अनेक बार दूसरे के कर्मों के कारण भी परिणाम प्रभाव के रूप में ( फल रूप में नहीं ) सुख दुःख प्राप्त हो जाते है |

४३) किन लक्षणों के आधार पर यह कह सकते है की किस व्यक्ति ने जीवात्मा का साक्षात्कार कर लिया है ?
उत्तर = मन, इन्द्रियों पर अधिकार करके सत्यधर्म न्यायाचरण के माध्यम से शुभकर्मों को ही करणा और असत्य अधर्म के कर्मों को न करना तथा सदा शांत, संतुष्ट और प्रसन्न रहना इस बात का ज्ञापक होता है की इस व्यक्ति ने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है |

शरीर- इन्द्रियां

१) मानव शरीर प्राप्ति  का क्या  प्रयोजन है ?
उत्तर = अपने कर्मफल का भोग करना एवं  मोक्ष ( दुःखों  से छूटना ) की प्राप्ति  करना है ।

२) आत्मा के कर्म करने के साधन कितने हैं  ?
उत्तर =   १) आंतरिक  साधन - मन, बुद्धि,  अहंकार  आदि
             २) बाह्य साधन - हाथ, पैर, नाक, कान, मुहँ ।

३) शरीर मे कुल कितनी  इंद्रियाँ है ?
उत्तर = शरीर मे ११ इंद्रियाँ  है । १) पाँच  कर्म इंद्रियाँ  २) पाँच  ज्ञानेन्द्रियाँ ३) मन ।

४) मन का मुख्य  कार्य क्या है ?
उत्तर = संकल्प विकल्प  करना ।

५) पाँच  ज्ञानेन्द्रियों के नाम एवं उनके कार्य बतायें?
उत्तर =   इन्द्रिय             कार्य
               घ्राण              गंध लेना
             रसना              स्वाद लेना
               चक्षु                 देखना
               श्रोत्र                सुनना
               त्वक्             स्पर्श करना

६) पाँच  कर्मन्द्रियों के नाम एवं  कार्य ?
उत्तर =       इन्द्रिय             कार्य
                   हस्त             अदान-प्रदान
                   पाद               चलना
                   जिह्वा            बोलना, भोजन करना
                  उपस्थ           मूत्र त्याग करना
                   गुदा              मल त्याग करना

७)  मन उत्पत्ति  चिससे होती है ?
उत्तर = अहंकार नामक तत्त्व से होती है ।

८) मन की कितनी अवस्थाएँ होती है ?
उत्तर = पाँच । १) क्षिप्त  २) विक्षिप्त  ३) मूढ़  ४) एकाग्र  ५)  निरुद्ध ।

९) मन मे उठने वाले विचार वृत्तियाँ  कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर  = पाँच  । १)  प्रमाण वृत्ति  २)  विपर्यय वृत्ति  ३) विकल्प वृत्ति  ४) निद्रा वृत्ति  ५) स्मृति  वृत्ति ।

१०) मन के दोष कितने है ?
उत्तर  = तीन ।  १) राग  २) द्वेष  ३)  मोह ।

११)  मन को शुद्ध  करने के क्या क्या उपाय हैं  ?
उत्तर =  १)  शुद्ध  ज्ञान प्राप्त  करना ।
            २)  धर्म कार्य करना ।
            ३)  ईश्वर  की उपासना करना ।

१२)  मन जड़ पदार्थ  है या चेतन या दोनो ?
उत्तर = मन जड़ पदार्थ  है ।

१३)  मन को शुद्ध  करने  से क्या लाभ होता है ?
उत्तर =  मन को शांति  तथा स्थिरता की प्राप्ति  होती है ।

१४) मन को एकाग्र करना संभव है  या असंभव?
उत्तर = संभव  है ।

१५)  मन को एकाग्र करने के उपाय कौन से हैं ?
उत्तर = ईश्वर  का चिंतन करना व उसकी आज्ञाओ का पालन करना अर्थात्  योगाभ्यास  करना तथा गायत्री आदि मंत्रो का जाप करना ।

१६)  मन अशुद्ध  कैसे  होता है ?
उत्तर = मांसाहार,  नशा करने तथा अश्लील  साहित्य  आदि के पढने से मन अशुद्ध  हो जाता है एवं वैर-विरोध, झूठ बोलना आदि से भी मन अशुद्ध  होता है ।

१७) मानसिक तनाव को कैसे दूर कर सकते है ?
उत्तर = अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करके, बहुत से काम एक साथ आरम्भ न करके, अपनी क्षमता से अधिक कार्य स्वीकार न करके, अपनी इच्छाओ  को कम करके तथा ईश्वर का ध्यान करके मानसिक तनाव को दूर कर सकते है |

१८) मानव जीवन में कौन सी विशषताएँ है जो अन्य प्राणियों में नहीं है ?
उत्तर = १) विकसित वाणी २) उत्तम बुद्धि  ३) हाथ  ४) कर्म करने की स्वतंत्रता

१९) किसके धारण करने पर मानव पशु-पक्षी आदि से श्रेष्ट बनता है ?
उत्तर = धर्म के धारण करने पर मानव पशु, पक्षी आदि से श्रेष्ट बनता है |

२०) ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ किससे जुड़कर कार्य करती है ?
उत्तर = ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ मन से जुड़कर कार्य करती है |

२१) मन किससे जुड़कर कर करता है ?
उत्तर = आत्मा |

२२) बुद्धि का मुख्य कार्य क्या है ?
उत्तर = निर्णय लेना |

२३) अहंकार का क्या कार्य है ?
उत्तर = अहंकार का कार्य ' मैं ' की अनुभूति करवाना है कि मेरी सत्ता है = मैं हुँ |

२४) मुख्यरूप से शरीर कितने प्रकार के होते है ?
उत्तर = चार प्रकार के होते है |
            १) अण्डज २) जरायु ३) स्वेदज ४) उभ्दिज्ज |

२५) शरीर कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर = शरीर  तीन प्रकार का होता है |
            १) स्थूल शरीर २) सुक्ष्म शरीर ३) कारन शरीर |

२६) शरीर और संसार के निर्माण (उतपत्ति) कि संक्षिप्त प्रक्रिया क्या है ?
उत्तर = प्रकृति से सर्वप्रथम महत्ततत्त्व कि उत्पत्ति होती है | महत्ततत्त्व से अहंकार नामक तत्त्व उत्पन्न होता है | अहंकार से पंचतन्मात्राएँ एवं इन्द्रियाँ | तन्मात्राओं से पंचमहाभूत उत्त्पन्न होते है तथा पंचमहाभूत से शरीर और संसार का निर्माण होता है |

२७) अंतःकरण किसे कहते है ?
उत्तर = आत्मा के निकटम साधन मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को अंतःकरण कहते है |

२८) सुक्ष्म शरीर में कुल कितने तत्त्व होते है उनके नाम लिखो ?
उत्तर = सुक्ष्म शरीर में कुल १८ तत्त्व होते हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच तन्मात्राएँ और मन, बुद्धि तथा अहंकार |

२९) क्या सुक्ष्म, शरीर स्थूल शरीर के नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाता है ?
उत्तर = नहीं, स्थूल शरीर के नष्ट होने पर भी सुक्ष्म शरीर नष्ट नहीं होता है अपितु जब तक जीवात्मा कि मुक्ति न हो जाये, तब तक यह जीवात्मा के साथ में जन्म जन्मान्तर तक चलते रहता है अथवा प्रलय समय में नष्ट होता है |

३०) कारण शरीर किसे कहते है ?
उत्तर = सत्व, रज और तम इन तीन तत्वों को कारण शरीर कहते है |

३१) सभी जीवों का कारण शरीर अलग अलग है अथवा एक ही है ?
उत्तर =  सभी जीवों का कारण शरीर अलग अलग नहीं होता  है अपितु एक ही है |

३२) क्या कारण शरीर के समान, सुक्ष्म शरीर , स्थूल शरीर सभी जीवों का एक ही होता है ?

उत्तर = नहीं , सभी जीवों का सुक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर अलग अलग होता है |