सच्ची रामायण खंडनम्

अथ पेरियार रचित "सच्ची रामायण" खंडनम्।

         धर्मप्रेमी सज्जनों ! मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम तथा योगेश्वर श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के दो आधार स्तंभ हैं।केवल सनातनधर्म के लिये ही नहीं अपितु मानव मात्र के लिये श्रीराम और श्रीकृष्ण आदर्श हैं।किसी के लिये श्रीरामचंद्र जी साक्षात् ईश्वरावतार हैं तो किसी के लिये एक राष्ट्रपुरुष,आप्तपुरुष और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।परंतु इन दोनों श्रेणियों ने श्रीराम का गुण-कर्म-स्वभाव सर्वश्रेष्ठ तथा अनुकरणीय माना है। समय- समय पर भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने के लिये नास्तिक,वामपंथी अथवा विधर्मी विचारधारा वाले लोगों ने ” कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी”, “सीता का छिनाला”,” रंगीला कृष्ण ” जैसे घृणास्पद साहित्य की रचना की।इन पुस्तकोॉ का खंडन भी आर्यविद्वानों ने किया है।इसी परंपरा ( या कहें कुपरंपरा) में श्री पेरियार रामास्वामी नाइकर” की पुस्तक ” सच्ची रामायण ” है।

    मूलतः यह पुस्तक तमिल व आंग्लभाषा में लिखी गई थी। परंतु आर्यभाषा में भी यह उपलब्ध है। पेरियार महोदय ने उपरोक्त पुस्तक में श्रीराम,भगवती सीता,महाप्राज्ञ हनुमान् जी, वीरवर लक्ष्मण जी आदि आदर्श पात्रों( जो जीवंत व्यक्तित्व भी थे)पर अनर्गल आक्षेप तथा तथ्यों को तोड़- मरोड़कर आलोचना की है। पुस्तक क्या है, गालियों कापुलिंदा है। लेखक न तो रामजी को न ईश्वरावतार मानते हैं न ही कोई ऐतिहासिक व्यक्ति । लेखक ने श्रीराम को धूर्त,कपटी,लोभी,हत्यारा और जाने क्या-क्या लिखा है।वहीं रावण रो महान संत,वीर,ईश्वर का सच्चा पुत्र तथा वरदानी सिद्ध करने की भरसक प्रयास किया है। जहां भगवती,महासती,प्रातःस्मरणीया मां सीता को व्यभिचारिणी,कुलटा,कुरुपा,अंत्यज संतान होने के मनमानै आक्षेप लगाये हैं,वहीं शूर्पणखा को निर्दोष बताया है। पेरियार साहब की इस पुस्तक ने धर्म विरोधियों का बहुत उत्साह वर्धन किया है।आज सोशल मीडिया के युग में हमारे आदर्शों तथा महापुरुषों का अपमान करने का सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है। यह पुस्तक स्वयं वामपंथी,नास्तिक तथा स्वयं को महामहिम डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का अनुयायी कहने वालों में खासी प्रचलित है।आजकल ऐसा दौर है कि भोगवाद में फंसे हिंदुओं(आर्यों) को अपने सद्ग्रंथों का ज्ञान नहीं होता। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:- कलिमल ग्रसे ग्रंथ सब,लुप्त हुये सदग्रंथ। दंभिन्ह निज मत कल्प करि,प्रगट किये बहु पंथ।। ( मानस,उत्तरकांड दोहा ९७ क ) अर्थात् ” कलियुग में पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया।दंभियों ने अपनी बुद्धि कल्पना कर करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिये।” इसी विडंबना के कारण  जब भोले भाले हिंदू के समक्ष जब इस घृणास्पद पुस्तक के अंश उद्धृत किये जाते हैं तो धर्मभीरू हिंदू का खून खौर उठता है।परंतु कई हिंदू भाई अपने धर्म,सत्यशास्त्रों का ज्ञान न होने के कारण ग्लानि ग्रस्त हो जाते हैं।उनका स्वाभिमान घट जाता है, अपने आदर्शों पर से उनका विश्वास उठ जाता है। फलस्वरूप वे नास्तिक हो जाते हैं या मतांतरण करके ईसाई ,बौद्ध या मुसलमान बन जाते हैं। “सच्ची रामायण” का आजतक किसी विद्वान ने सटीक मुकम्मल जवाब दिया हो, ऐसा हमारे संज्ञान में नहीं है।अतः हमने इस पुस्तक को जवाब के रूप में लिखने का कार्य आरंभ किया है।

      इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य

१:- पेरियार साहब की पुस्तक जो श्रीराम जी के निष्पाप चरित्र रर लांछन लगाती है का समुचित उत्तर देना।
२:- आम हिंदू आर्यजन को ग्लानि से बचाकर अपने धर्म संस्कृति तथा राष्ट्र के प्रति गौरवान्वित कराना।
३:- श्रीराम के दुष्प्रचार,रावण को अपना महान पूर्वज बताते,तथा आर्य द्रविड़ के नाम पर राजनैतिक स्वार्थपरता, छद्मदलितोद्धार तथा अराष्ट्रीय कृत्य का पर्दाफाश करना।
४:- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी के पावन,निर्मल,आदर्श चरित्र को मानव मात्र के लिये श्लाघनीय तथा अनुकरणीय सिद्धकरना।

ओ३म विश्वानिदेव सवितर्दुरितानी परासुव यद्भद्रं तन्न आसुव। यजुर्वेद:-३०/३ अर्थात् ” हे सकल जगत् के उत्पत्ति कर्ता,शुद्धस्वरूप,समग्र ऐश्वर्य को देने हारे परमेश्वर!आप ह मारे सभी दुर्गुणों,दुर्व्यसनों और दुःखो को दूर कीजिये।जो कल्याणकारक गुण-कर्म-स्वभाव तथा पदार्थ हैं वे हमें प्राप्त कराइये ताकि हम वितंडावादी,असत्यवादी,ना स्तिक पेरियारवादियों के आक्षेपों का खंडन करके भगवान श्री रामचंद्र का निर्मल यश गानकर वैदिक धर्म की विजय पताका फहरावें।

।।ओ३म शांतिः शांतिः शांतिः।।

( पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये धन्यवाद । खंडन कार्य अगली पोस्ट से प्रारंभ होगा। पुस्तक लेखन का कार्य चल रहा है। कृपया खंडन पुस्तक का नाम भी सुझावें। पोस्ट जितना अधिक हो प्रचार करें ताकि नास्तिक छद्मता का पर्दाफाश हो।) मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र की जय। योगेश्वर श्रीकृष्ण चंद् की जय |


नास्तिक मत का खंडन .......... भाग 1



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नास्तिक व्यक्ति के विचार
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नास्तिको की ओर से आस्तिकों पर आजकल बड़े बल के साथ यह आक्षेप किया जाता है की संसार में ईश्वर नाम की कोई वस्तु है ही नहीं | यदि होती , तो आँखों से अवश्य दिखाई देती , जैसे की भूमि जल अग्नि आदि वस्तुए दिखती है | आज तक एक नही ईश्वर-विश्वासी ने न तो अपनी आँखों से उस काल्पनिक ईश्वर को देखा है ओर न ही किसी अन्य अविश्वासी को दिखा सका है | आस्तिक लोग ईश्वर-ईश्वर तो दिन-रात रटते रहते है, किन्तु  वास्तव में इस 'ईश्वर' शब्द के पीछे सत्तात्मक वस्तु कोई भी नहीं है | जैसे ' करगोश का सींग ' आकाश का फूल  वन्ध्या का पुत्र नहीं होता फिर भी कहा जाता है, वैसे ही 'ईश्वर' है नहीं, किन्तु मात्र कहा जाता है | हम विज्ञान वाले तो केवल उन्ही वस्तुओ को मानते है जो आँखों से , माइक्रोस्कोप से या टेलिस्कोप से दिखाई देती है, अर्थात हम केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को मानते है, अनुमान ओर शब्द प्रमाण को नहीं मानते |

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आस्तिक व्यक्ति के विचार
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         सर्व प्रथम इस विषय पर विचार करते है की क्या ईश्वर ही एक ऐसी वस्तु है जो आँखों से दिखाई नहीं देती, या अन्य भी इसी प्रकार की कुछ वस्तुए  है जो आँखों से दिखाई नहीं देती | यदि कुछ गंभीरता से विचार किया जाये तो पता चलेगा की एक नहीं अनेक ऐसी वस्तुए संसार में है, जो आँखों से दिखाई नहीं देती, फिर भी लोग उसको मानते है ओर उनसे काम भी लेते है | जैसे सुख-दुःख , भूख-प्यास , ईर्ष्या-द्वेष , मन-बुद्धि, शब्द, गंध, वायु आदि | इनमे से एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो आँखों से दिखाई देती हो फिर भी नास्तिक इन वस्तुओ को स्वीकार करते है | फिर ईश्वर के साथ ही यह अन्याय क्यों ! की ईश्वर दिखाई नहीं देता , इसलिए हम उसे नहीं मानते |

        बुद्धिपूर्वक विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है की --- आँखों से किसी वस्तु का दिखाईन देना अन्य बात है, तथा वस्तु का सत्तारूप में न होना अन्य बात है | यह कोई नियम नहीं की जो वस्तु आँखों से दिखाई न देवे, वह सत्ता रूप में भी नहीं होती है |

खरगोश का सींग , आकाश का फूल   वन्ध्या का पुत्र  आदि जो उद्धरण आपने अपने पक्ष की पुष्टि में दिए है , वे वस्तुए तो वास्तव में सत्तात्मक होती ही नहीं है , केवल उनकी कल्पना करली जाती है | ऐसी वस्तुओ का आँखों से दिखाई न देना तो हम भी मानते है जो भावरूप में होती ही नहीं है | परन्तु कुछ वस्तुए , जो किन्ही कारणों से हम आँखों से देख नहीं पाते है , उनको न मानना उचित नहीं है | जैसे की पहले उद्धरण दिए जा चुके है , वायु, सुख-दुःख, भूक-प्यास, शब्द-गंध आदि | ये सब आँखों से न दीखते हुए भी सत्तात्मक है | ऐसे ही ईश्वर भी आँखों से नहीं दिखता, फिर भी वह एक सत्तात्मक पदार्थ है, ओर उसका प्रत्यक्ष भी होता है |

आपने जो यह कहा की हम केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को ही मानते है, अनुमान ओर शब्द प्रमाण को नहीं, वास्तव में ऐसी बात नहीं है | आज प्रत्येक भौतिक-वैज्ञानिक ओर विज्ञान का विद्यार्थी प्रत्यक्ष के साथ-साथ अनुमान ओर शब्द प्रमाण को भी स्वीकार करता है | उद्धरण के लिए पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षणशक्ति ( Gravitational Force ), विद्युत तरंगे ( electro magnetic waves), अल्फा, बीटा, गामा तथा एक्स किरणों ( alpha, beta , gamma , X -rayes ) को भी किसी भी  वैज्ञानिक ने आजतक अपनी आँखों से नहीं देखा है, फिर भी सभी वैज्ञानिक इनकी सत्ता को स्वीकार करते है |

    इसी प्रकार से किसी भी वैज्ञानिक ने इस पृथ्वी को बनते हुए नहीं देखा, फिर भी अनुमान के आधार पर यह मानते है की हमारी पृथ्वी लगभग इतने वर्ष पुरानी है | किसी भी वैज्ञानिक ने अपने पिता की सातवी पीढ़ी के व्यक्ति को नहीं देखा तो भी क्या कोई वैज्ञानिक अपने पिता की सातवी पीढ़ी की सत्ता का इंकार कर सकता है ? ये सब अनुमान प्रमाण के उद्धरण है |

    प्रत्येक विज्ञान का विद्यार्थी न्यूटन, आइंस्टीन आदि बड़े बड़े वैज्ञानिको के बनाये हुए गुरुत्वाकर्षण और गति आदि के नियमो को , बिना स्वयं परीक्षण किये केवल मात्र पुस्तक से पढ़कर यथावत स्वीकार करता है | इसी प्रकार से जिन-जिन वैज्ञानिक ने सूर्य के आकर , परिधि , तापमान , भर आदि के सम्बन्ध में जो-जो विवरण दिए तथा आकाशगंगा ( galaxy ) के तारो , उनकी परस्पर दुरी गति आदि के विषय में जो बाते लिखी है, उनको विज्ञान के विद्यार्थी सत्य स्वीकार करते है | ऐसे ही इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूटॉन को सभी विद्यार्थी सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से स्वयं नहीं देखते , फिर भी वैज्ञानिको के कथन को सत्य मानते है | ये सब शब्द प्रमाण को स्वीकार करने के उद्धरण है |

जैसे विज्ञान के क्षेत्र में  वस्तुए तीनो प्रमाणों से सिद्ध होती है, और मानी जाती है, वैसे ही श्वर भी तीनो प्रमाणों से सिद्ध होता है , अतः उनको मानना चाहिए | परन्तु ईश्वर का प्रत्यक्ष नेत्रदि इन्द्रिय से नहीं  होता, बल्कि मनादि  अंतकरण से होता है | ईश्वर की सिद्धि तीनो प्रमाणों से होती है, इसे निम्न प्रकार से समझना चाहिए ---

ईश्वर की सिद्धि प्रत्यक्ष प्रमाण से :- प्रत्यक्ष दो प्रकारक का होता है , एक बाह्य , दूसरा आतंरिक | नेत्रादि इन्द्रियों से रूपादि विषय वाली वस्तुओ का जो प्रत्यक्ष होता है, वह बाह्य प्रत्यक्ष कहलाता है; और मन-बुद्धि आदि अंतकरण से सुख-दुःख, राग-द्वेष , भूख-प्यास आदि का जो प्रत्यक्ष होता है, वह आन्तरिक प्रत्यक्ष कहलाता है |

        जैसे रूपादि विषय वाली वस्तु को देखने के लिए नेत्रादि इन्द्रियों का स्वस्थ-स्वच्छ  तथा कार्यकारी होना आवश्यक है, वैसे ही आत्मा-परमात्मा को प्रत्यक्ष करने के लिए मन-बुद्धि  आदि अंतकरण का भी स्वस्थ तथा पवित्र होना अनिवार्य है | जैसे आँख में धुल गिर जाने पर या सूजन हो जाने पर या मोतियाबिंद हो जाने पर वस्तु दिखाई नहीं देती, वैसे ही राग-द्वैषादि के कारन मन आदि अंतकरण के पवित्र या रजोगुण के कारन चंचल हो जाने पर आत्मा-परमात्मा  का प्रत्यक्ष नहीं होता | जैसे सुख-दक्षादि विषयो का प्रत्यक्ष नेत्रादि बाह्य इन्द्रियों से नहीं होता , केवल रूप-रसादि विषयो का ही होता है , वैसे ही आत्मा-परमात्मा मन-बुद्धि आदि सूक्ष्म विषयो का प्रत्यक्ष भी नेत्रादि इन्द्रियों से नहीं होता, मन आदि अन्तकरण से होता है , यह ईश्वर के प्रत्यक्ष करने की पद्धति है |

ईश्वर सिद्धि अनुमान प्रमाण से :- इसी प्रकार अनुमान प्रमाण से भी ईश्वर की सिद्धि होती है | कोई भी वस्तु यथा मकान , रेल , घड़ी आदि बिना बनाने वाले के नहीं बनती, चाहे हमने मकान, रेल, घड़ी आदि के बनाने वाले की सत्ता को मानते है | ठीक इसी प्रकार से वैज्ञानिक लोग इन पृथ्वी, सूर्यादि की उत्पत्ति करोडो वर्ष पुरानी मानते है | इससे भी सिद्ध है की इनको बनाने वाला भी कोई न कोई अवश्य ही है | क्यूोंकि ये पृथ्वी , सूर्यादि जड़ पदार्थ अपने आप बन नहीं सकते, जैसे की रेल आदि अपने आप नहीं बन सकते | और न सूर्यादि को मनुष्य लोग बना सकते है , क्यूोंकि मनुष्यो में इतना सामर्थ्य और ज्ञान नहीं है | इसलिए जो इन्हे बनता है , वही ईश्वर है |

ईश्वर सिद्धि शब्द प्रमाण से :- जिन साधको (ऋषियों) ने याम नियमादि योग के आठ अंगो का अनुष्ठान करके मन आदि अंतकरण को एकाग्र व पवित्र बनाया, वे कहते है की समाधी में आत्मा-परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है | किन्तु यह प्रत्यक्ष नेत्रदि इन्द्रियों से होने वाले बाह्य प्रत्यक्ष के सामान रंग रूप वाला न होकर, सुख-दुःखादि के सामान आन्तरिक अनुभूति है | ऋषियों का अनुभव यह है, जो हमारे लिए शब्द प्रमाण है –

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यं |
अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभोयं  पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषा: ||
मुण्ड्कोपनिषद ३-१-५

 अर्थ - यह भगवान (ईश्वर) सदा सत्य आचरण से, तप से , यथार्थ ज्ञान से और ब्रम्हचर्य से प्राप्त किया जाता है | वह शरीर के भीतर ही प्रकाशमय (ज्ञानस्वरूप) और शुद्ध (पवित्र) स्वरुप में विद्यमान है | योगी लोग रागद्वेष आदि दोषो को नष्ट करके समाधी में उस देख (अनुभव कर) लेते है |

     जैसे वैज्ञानिक के विवरण पृथ्वी, सूर्य, आकाशगंगाओ आदि के सम्बन्ध में शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार किये जाते है , क्योंकि  उन्होंने उन विषयो को ठीक-ठीक जाना है | इसी प्रकार से ऋषियों के भी ईश्वर सम्बन्धी विवरण शब्द प्रमाण के रूप में अवश्य ही स्वीकार करने चाहिए, क्योकि उन्होंने भी समाधि माध्यम से ईश्वर को ठीक-ठीक जाना है |

         इस लिए तीनो प्रमाणों से ईश्वर की सत्ता सिद्ध है | नास्तिक लोग उपर्युक्त तीनो प्रमाणों पर विशेष ध्यान दे और शुद्ध अंतकरण से आत्मा के द्वारा ईश्वर के आतंरिक प्रत्यक्ष को स्वीकार करे, यही न्याय की बात है | अन्यथा आँख से न दिखने वाली वायु, शब्द, गंध, सुख-दुःख, मन-बुद्धि , भूक-प्यास, दर्द आदि और पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति , विद्युत तरंगो , अल्फा , बीटा, गामा , और एक्स किरणों को भी मानना छोड़ दे | यदि इनको मानना नहीं चाहते है तो ईश्वर की सत्ता को भी स्वीकार करे |



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नास्तिक मत खंडन भाग  २

नास्तिक मत खंडन भाग........ २



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नास्तिक व्यक्ति के विचार
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आप आस्तिक लोग ईश्वर के होने में यह अनुमान करते है की - संसार बनायीं हुए चीज है , यह बिना किसी के बनाये बन नहीं सकते, इसलिए जो  इसका बनाने वाला है, वही ईश्वर है | आपकी इस बात में कोई बल नहीं है, क्यूंकि हम स्पष्ट ही देखते है की-- प्रतिवर्ष हजारो लाखो की संख्या में जंगलो में वृक्ष-वनस्पति-औषधि-लताएँ-कन्द-मूल-फलादि- अपने आप उत्त्पन्न होते है, बढ़ाते है, और नष्ट हो जाते है | इनका कोई कर्त्ता दिखाई नहीं देता, वैसे ही संसार के पृथ्वी , सूर्य , चन्द्रमा , आदि पदार्थ अपने आप बनते है , चलते है और नष्ट हो जाते है | इसको बनाने , चलने के लिए किसी कर्त्ता की आवश्यकता नहीं है | इसलिए आपका काल्पनिक ईश्वर असिद्ध है |

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आस्तिक के विचार
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            पहले यह विचारने का विषय है की क्या कोई कार्य वस्तु अपने आप ही बन जाती है या किसी कर्त्ता के द्वारा बनाने से ही बनती है ? संसार में हम प्रत्यक्ष ही देखते है की -- मकान आदि कार्य वस्तु के लिए मिस्त्री-मजदूर ( निमित्त- कारन = कर्त्ता ) की आवश्यकता पड़ती है | बिना मिस्त्री-मजदूर के मकान  कदापि नहीं बन सकता | फिर भला पृथ्वी , सूर्य , चन्द्र आदि कार्य वस्तुओ के लिए निमित्त कारन = कर्त्ता = ईश्वर की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ेगी ? अवश्य पड़ेगी | प्रत्येक कार्य के लिए निमित्त कारन = कर्त्ता का नियम पाया जाता है |

           जैसे पैन, पुस्तक, मेज , कुर्सी , पालन , पंखा, रेडिओ , घडी मोटर, रेल, हवाई जहाज आदि वस्तुओ को बनाने वाले कर्त्ता के रूप में मनुष्य लोग हो होते है | क्या ये चीजे बिना बनाने वाले के अपने आप बन सकती है? कदापि नहीं | " बिना बनाने वाले के कोई वास्तु अपने आप नहीं बन सकती "* इसी नियम को प्राचीन भारतीय महान वैज्ञानिक महर्षि कणाद ने भी स्वीकार किया है -- *कारणाऽभावात्  कार्यऽभावः || - वैशेषिक दर्शन १-२-१

           आपने पृथ्वी आदि कार्य वस्तुओ के अपने आप बन जाने की पुष्टि में जंगल के वृक्षों आदि का जो उद्धरण दिया है, वह ठीक नहीं है | क्यूंकि उद्धरण वह देना चाहिए, जो पक्ष और विपक्ष दोनों को सामान रूप से स्वीकार हो , जैसा न्याय दर्शन कार महर्षि गौतम ने अपने ग्रन्थ न्याय दर्शन ( १-१४-२५ ) में लिखा है " लौकिक  परीक्षकाणाम्  यस्मितर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः || "

अर्थ - जिस वस्तु को सामान्य व्यक्ति और विद्वान व्यक्ति दोनों एक स्वरुप में स्वीकार करते ही वह दृष्टांत  या उद्धरण कहलाता है | जैसे ' अग्नि जलती है ' इसे सब मानते है , आप भी और हम भी |

        हम जंगल के वृक्षों को अपने आप उत्त्पना हुवा नहीं मानते | उनका भी कोई कर्त्ता है, और वह है सर्वव्यापक , सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान ईश्वर | जैसे हमने अपने पक्ष की पुष्टि में जो मकान आदि के उद्धरण दिए है, वे आपको भी मान्य है , वैसे ही आपको , अपने-आप बनी हुए वस्तु का ऐसा उद्धरण देना चाहिए, जो हमे भी मान्य हो | हमारी दृष्टी में तो संसार में आपको अपने-आप बनी हुए वस्तु का एक भी उद्धरण नहीं मिलेगा | क्योंकि यह सत्य सिद्धांत है की अपने आप कोई वस्तु बन ही नहीं सकती | जब बन ही नहीं सकती , तो उद्धरण भी नहीं मिलेगा | जब उद्धरण ही नहीं मिलेगा , तो आपके पक्ष की सिद्धि कैसे होगी ? क्योंकि बिना उद्धरण के तो कोई पक्ष सिद्ध हो नहीं सकता | इसलिए उद्धरण के आभाव में आपका पक्ष सिद्ध नहीं होता |

          जो आपने सूर्यादि पदार्थो के बिना किसी कर्त्ता के अपने आप बन जाने की बात कही है, इस पर गम्भीरता से विचार करे | यह तो आप भी मानते है की पृथ्वी आदि पदार्थ जड़ है और प्रकृति के छोटे छोटे परमाणुओ के परस्पर मिलने से बने है | ये सब परमाणु भी जड़ है, इनमे ज्ञान या चेतना तो नहीं , फिर ये स्वयं आपस में मिलकर पृथ्वी आदि के रूप में कैसे बन सकते है ? इस में चार पक्ष हो सकते है -

१) यदि आप कहो की इन सब परमाणुओ में परस्पर मिलकर पृथ्वी आदि के रूप में बन जाने का स्वभाव है; तो एक बार मिलकर ये परमाणु पृथ्वी आदि पदार्थो का रूप धारण तो कर लेंगे परन्तु अलग कभी नहीं होंगे अर्थात प्रलय नहीं होगी | क्यूंकि एक जड़ वस्तु में एक काल में दो विरुद्ध धर्म (मिलना और अलग-अलग होना ) स्वाभाविक नहीं हो सकते |

२) यदि कहो की इन सब परमाणुओ में अलग-अलग रहने का स्वाभाव है तो फिर ये परस्पर मिलकर पृथ्वी आदि का रूप धारण कर ही नहीं सकेंगे, क्योंकि कोई भी वस्तु अपने स्वाभाव से विरुद्ध कार्य नहीं कर सकती | ऐसी स्तिथि में संसार कैसे बनेगा ?

३) यदि कहो की कुछ परमाणुओ में मिलने का स्वाभाव है और कुछ में अलग-अलग रहने का, ऐसी अवस्था में , यदि मिलने वाले परमाणुओ की अधिकताहोगी , तब संसार बन जायेगा परन्तु नष्ट नहीं होगा | यदि अलग-अलग रहने वाले परमाणुओ की अधिकता होगी तो संसार बनेगा नहीं, क्योंकि जो परमाणु अधिक होंगे , उनकी शक्ति अधिक होगी और वे अपना कार्य सिद्धि कर लेंगे |

४) यदि कहो की मिलने व् अलग-अलग रहने वाले दोनों प्रकार के परमाणु आधे-आधे होंगे , तो ऐसी अवस्था में भी संसार बन नहीं पायेगा | क्योंकि दोनों प्रकार के परमाणुओ में सतत संघर्ष ही चलता रहेगा .

इन चारो में से कोई भी पक्ष संसार में पदार्थो के बनने और बिगड़ने की सिद्धि नहीं कर सकता, जो की संसार में प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उपलब्ध है | यदि आप कहो की स्वचालित यन्त्र (automatic machine ) के समान प्रकृति के परमाणुओ का अपने आप संसार रूप में बनना व बिगड़ना चलता रहता है, तो आपका यह दृष्टांत भी ठीक नहीं, क्योंकि स्वयंचलित यन्त्र को भी तो स्वयंचलित बनाने वाला कोई चेतन कर्त्ता होता ही है | अतः' बिना कर्त्ता के कोई कार्य वस्तु नहीं बनती ' यह सिद्धांत अनेक उद्धरणों से , अच्छे प्रकार से हमने सिद्ध कर दिया है |

            अब आप महान भौतिक वैज्ञानिक महाशय न्यूटन के अभिप्रेरणा नियम ( law of motion ) के साथ भी अपनी स्वाभाव से संसार बन जाये की बात मिलकर देख लीजिये | नियम यह है की -
( a body in state of rest or of motion will continue in state of rest or motion until an external force is applied )

   अर्थात - कोई भी स्थिर पदार्थ तब तक अपनी स्थिर अवस्था में ही रहेगा जब तक किसी बाह्य बल से उसे गति न दी जाये , और कोई भी गतिशील पदार्थ तबतक अपनी गतिशील अवस्था में ही रहेगा जबतक किसी बाह्य बल से उसे रोक न जाये |

         अब प्रश्न यह है की संसार के बनने से पूर्व परमाणु यदि स्थिति की अवस्था में थे , तो गति किसने दी ? यदि सीधी गति की अवस्था  में थे , तो गति में परिवर्तन किसने किया, की जिसके कारन ये परमाणु संयुक्त होकर पृथ्वी आदि पदार्थ के रूप में परिणत हो गए | स्थिर वस्तु को गति देना और गतिशील वस्तु की दिशा बदलना ये दोनों कार्य बिना चेतन कर्त्ता के हो ही नहीं सकते | महाशय न्यूटन ने अपने नियम में इस कर्त्ता को बाहरी बल = (external force ) के नाम से स्वीकार किया है |

         संसार की घटनाओ का गंभीरता से अध्ययन करने पर पता चलता है की -- संसार की विशालता , विविधता , नियमबद्धता , परस्पर ऐक्यभाव , सुक्ष्म रचना कौशल , निरंतर संयोग-वियोग , प्रयोजन की सिद्धि आदि -- इन चेतना-रहित (जड़) परमाणुओ का कार्य कदापि नहीं हो सकता, इन सब के पीछे किसी सर्वोच्च बुद्धिमान , सर्वव्यापक , अत्यतं शक्तिशाली , चेतन कर्त्ता शक्ति का ही हात सुनिश्चित है , उसी को ' ईश्वर' नाम से कहते है |

            हम आप स्वभाववादियो ( naturalists ) इसे पूछते है की प्रकृति खेत में गेहू , चना , चावल तक बनकर ही क्यों रुक गई ! गेहूं से आटा, फिर आटे से रोटी तक बन कर हमारी थाली में क्यों नहीं आई ! गाय-भैस  के पेट में दूध तक ही क्यों सिमित रही; दूध से खोया , फिर खोये से बर्फी तक क्यों नहीं बनी ! कपास तक ही प्रकृति सिमित क्यों रही , उसकी रुई , फिर सूत , वस्त्र और वस्त्र से हमारी कमीज-पतलून तक क्यों नहीं बनी ! आपके पास इसका कुछ समाधान है ?

           हमारे पक्ष के अनुसार इसका समाधान यह है की कार्य वस्तुओ के बनाने वाले कर्त्ता दो है एक ईश्वर और दूसरा जीव ( मनुष्यादि प्राणी ) इनका कार्य-विभाजन इस प्रकार से है की -- प्रकृति परमाणुओ से पांच भूतो को बनाना और फिर इन भूतो से वृक्ष वनस्पति आदि को बनाना, यहाँ तक का कार्य ईश्वर का है , इससे आगे का कार्य मनुष्यो का है | जैसे की नदी बनाने का कार्य ईश्वर का है नदी से नहरे निकलने का कार्य मनुष्य का | मिट्टी बनाने का कार्य ईश्वर का है , मिट्टी से ईंट बनाकर मकान बनाने का कार्य मनुष्यो का है | पेड़ बनाने का कार्य ईश्वर का है और पेड़ से लकड़ी काटकर मेज-कुर्सी , खिड़की-दरवाजे बनाने का कार्य मनुष्यो का है | इसी प्रकार से गेहू , चना , कपास आदि बनाना मनुष्यो का कार्य है | कार्य कोई भी ही , हर जगह हर कार्य में कर्त्ता का होना आवश्यक है |


         इसलिए "संसार अपने-आप बन गया, इसका कर्त्ता कोई नहीं है " यह पक्ष किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं होता | तर्क प्रमाण से यही सिद्ध होता है की " प्रत्येक कार्य-वस्तु के पीछे कोई न कोई चेतन कर्त्ता अवश्य ही होता है, संसार में कोई भी वस्तु अपने आप नहीं बनती |" इसी नियम के आधार पर ' संसार का भी कर्त्ता होने से ईश्वर है |

पिछला भाग = 

नास्तिक मत खंडन भाग २


अगला भाग = 

नास्तिक मत खंडन भाग  ३

नास्तिक मत खंडन भाग ............... ३



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नास्तिक व्यक्ति के विचार
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               यह दिखाई देने वाला संसार न तो किसी ने बनाया है, और न ही यह अपने आप बना है ; न तो इसको कोई नष्ट करेगा और न ही कभी यह अपने आप नष्ट होगा | यह अनादि काल से ऐसे ही बना-बनाया चला आ रहा है और अनंत काल तक ऐसे ही चलता रहेगा | इस संसार के बनाने वाले किसी कर्ता को, किसी ने कभी नहीं देखा | यदि देखा होता तो मान भी लेते की हाँ, इसका कर्ता ईश्वर है | इसलिए कर्ता न दिखाई देने से यही बात ठीक लगाती है की यह संसार बिना कर्ता के अनादि काल से ऐसे ही बना-बनाया चला आ रहा है और आगे भी अनंतकाल तक चलता रहेगा |

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आस्तिक व्यक्ति के विचार
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                  प्रत्येक वस्तु के कर्ता का निर्णय केवल प्रत्यक्ष देखकर ही नहीं होता, बल्कि अनुमान आदि प्रमाणों से भी कर्ता का निर्णय होता है । बाजार से हम प्रतिदिन ऐसी अनेक वस्तुएँ लाते हैं, जिनको कारखानो, फैक्ट्रीयो , आदि में बनाया जाता हैं | इन वस्तुओ को बनाते हुए , कारीगरों को हम नहीं देख पाते हैं , तो क्या हम उन सबको बनी-बनाई मान लेते हैं ? जैसी की पेन , घडी, रेडिओ, टेप रिकॉर्डर , टेलीविजन , कार आदि | कोई भी बुद्धिमान इन वस्तुओ को बनी-बनाई नहीं मानता हैं | ऐसी अवस्था में पृथ्वी आदि विशाल ग्रह-उपग्रहो को बनाते हुए यदि हमने नहीं देखा तो यह कैसे मान लिया जाय की ' ये बने बनाए ही है' | जैसे पेन , घडी , रेडिओ , कार आदि को बनाने वाले करगीर, कारखानो में इनको बनाते है , वैसे ही पृथ्वी आदि पदार्थो को भी कोई न कोई अवश्य ही बनता है | जो बनाता है , वही ईश्वर है |

                     किसी भी व्यक्ति ने अपने शरीर को बनते हुए नहीं देखा तो क्या यह मान लिया जाए ' हम सब का शरीर सदा से बना-बनाया है यह कभी नहीं बना !' ऐसा तो मानते हुए नहीं बनता | क्योंकि हम प्रतिदिन ही दुसरो के शरीरों को जन्म लेता हुवा देखते है, और ऐसा अनुमान करते है की जन्म ९-१० मास पहले यह शरीर नहीं था | इस काल में इस शरीर का निर्माण हुआ है | जबकि हमने शरीर को बनते हुए नहीं देखा, फिर भी इसको बना हुआ मानते है| ठीक इसी प्रकार से पृथ्वी आदि पदार्थो को भी यदि बनते हुए न देख पाये , तो इतने मात्र से यह सिद्ध नहीं हो जाता की पृथ्वी आदि संसार के पदार्थ सदा से बने-बनाये है | जैसी हमने अपने शरीरो को बनते हुए नहीं देखा , फिर भी इन्हें बना हुआ मानते है , ऐसे ही पृथ्वी आदि पदार्थ भी हमने बनते हुए नहीं देखे , परन्तु ये भी बने है , ऐसा ही मानना चाहिए |

                       ' पृथ्वी बनी है ' इसे हम इस प्रकार भी समझ सकते है | ' जो भी वस्तु टूट जाती है , वह वस्तु कभी न कभी अवश्य ही बनी थी , ' यह सिद्धांत है | जैसे गिलास के किनारे पर एक हलकी चोट मारने से गिलास का एक किनारा टूट जाता है और यदि गिलास पर बहुत जोर से चोट मारी जाये , तो पूरा गिलास चूर-चूर हो जाता है | वैसे ही पृथ्वी के एक भाग पर फ्हावड़े-कुदाल से चोट मरने पर इसके टुकड़े अलग हो जाते है, तीव्र विस्फोटकों = (Dyanamite) आदि साधनो के द्वारा जोर से चोट करने पर बड़े-बड़े पहाड़ आदि भी टूट जाते है | इसी प्रकार अणु-परमाणु बमों आदि से बहोत जोर से चोट मरी जाये, तो पूरी पृथ्वी भी टूट सकती है | इससे सिद्ध हुआ की गिलास जैसे टूटा था --- तब जबकि वह बना था ; इसी प्रकार से पृथ्वी भी यदि टूट जाती है , तो वह भी अवश्य ही बनी थी | और इसको बनाने वाला ईश्वर ही है | इसी बात को हम पांच-अवयवों के माध्यम से निम्न प्रकार से समझ सकते है |

१ प्रतिज्ञा --- पृथ्वी आदि बड़े-बड़े ग्रह उत्त्पन हुए है |
२ हेतु -- तोड़ने पर टूट जाने से , जो वस्तु टूटती है वह बनी अवश्य थी |
३ उद्धरण -- गिलास के समान |
४- उपनय -- जैसे गिलास टूटता है, वह बना था ; वैसे ही पृथ्वी भी टूटती है, वह भी बनी थी |
५ निगमन --- क्योंकि पृथ्वी आदि ग्रह तोड़ने से टूट जाते है , इसलिए वे बने है |

                           विज्ञानं का यह सिद्धांत है की संसार सूक्ष्मतम भाग परमाणु ही केवल ऐसा तत्त्व है, जिसको न तो उत्त्पना किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है औए न ही नष्ट किया जा सक्ता है *-A matter can-neither be produced and nor be destroyed .* इस सिद्धांत के आधार पर परमाणु से स्थूल संसार से मिलकर बने है | और क्योंकि वे मिलकर बने है , इसलिए नष्ट भी हो जाते है | इससे सिद्ध होता है की पृथ्वी भी छोटे छोटे परमाणुओ से मिलकर बनी है , यह सदा से बनी-बनायीं नहीं है | और जब पृथ्वी बनी है , तो इसका बनाने वाला भी कोई न कोई अवश्य है | " कोई वस्तु अपने आप नहीं बनती " यह बात हम पिछले प्रकरण में = ( नास्तिक मत खंडन भाग २) में सिद्ध कर चुके है | इसलिए पृथ्वी आदि संसार के सभी पदार्थो को बनाने वाला ईश्वर ही है  , भले ही हमने ईश्वर को पृथ्वी आदि पदार्थ बनाते हुए न भी देखा हो |

                       पृथ्वी की उम्र के सम्बन्ध में भी विज्ञानं का मत देखिये -- विज्ञानं के मतानुसार पृथ्वी की उम्र लगभग ४ अरब ६० करोड़ वर्ष बताई गयी है | यह परिमाण पुरानी चट्टानों में विद्यमान यूरेनियम आदि पदार्थो के परीक्षण के पश्चात निकला गया है |

                    According to their deductions based on the study of rocks, the age of the Earth is estimated to be around 4600 million years. - MANORAMA. A Handy Encyclopaedia (year book 1983). page-105 , Science and Technology Section .


                       अनेक प्रकार के छोटे-छोटे उल्का पिण्ड आकाश में टूटते रहते है | इन उल्का पिंडो के खंड , जो पृथ्वी पर आकर गिरे है , भारतीय व विदेशी संग्रहालय में देखे जा सकते है | ये उल्का पिण्ड पृथ्वी के समान ही और मंडल के सदस्य है , और सूर्य के चारो और चक्कर लगाते रहते है | जब ये उल्का पिण्ड सौर मंडल के सदस्य होते हुए टूट जाते है, तो पृथ्वी भी सौर म ंडल का सदस्य होते हुए क्यों न टूटेगी ? इससे भी यह सिद्ध होता है की यह संसार सदा से बना बनाया नहीं है , बल्कि टूटता है और बनता है | इस समस्त संसार का बनाने और बिगड़ने वाला सर्वशक्तिमान = (omnipotent), सर्वव्यापक = (Ominipresent), सर्वज्ञ = (Omniscient) ईश्वर ही है |

पिछला भाग = 

नास्तिक मत खंडन भाग २


अगला भाग = 

नास्तिक मत का खंडन भाग ४

नास्तिक मत का खंडन .................. भाग ४



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नास्तिक व्यक्ति के विचार
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इस बात को हम प्रत्यक्ष ही जानते है की राजा के न होने पर नगर और समाज में अन्याय , चोरी , जारी, हिंसा , लड़ाई , झगड़े से अव्यवस्था उत्त्पन्न हो जाती है | राजा हो तो नहीं होती | विद्यालय में अध्यापक के न होने पर कक्षा में बच्चे शोर मचाते है. मार-पिटाई करते है; कक्षा में अध्यापक के होने पर नहीं करते धार्मिक , विद्वान , सभ्य माता-पिता के घर में न होने पर लड़के लोग परस्पर झगड़ते है, सिगरेट शराब पिते है , जुआ खेलते है , आचारहीन-स्वछंद बन जाते है , किन्तु माता-पिता के होने पर उपर्युक्त दुष्ट कर्म नहीं करते | इस प्रकार संसार का स्वामी , राजा , संचालक , न्यायाधीश कोई ईश्वर होता तो संसार में हिंसा , चोरी , जारी , अन्यायादि के रूप में जो अव्यवस्था फैली हुए है , वह नहीं होती | चूकी अव्यवस्था स्पष्ट दिख रही है , इससे तो यह सिद्ध होता है की ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है |

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आस्तिक के विचार
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संसार में जो अव्यवस्था दिखाई देती है , यह मनुष्यो द्वारा फैलाई गयी है | इसके आधार पर आपका यह कहना उचित नहीं है कि---- 

" ईश्वर कि संसार में कोई सत्ता नहीं है , यदि ईश्वर होता , तो यह अव्यवस्था नहीं होती |" क्योंकि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है | अपने अज्ञान , हठ, दुराग्रह , स्वार्थ आदि दोषो के कारण चोरी , जारी , हिंसा , अन्याय आदि बुरे कर्मो को करता है | यदि मनुष्य कर्म करने में ईश्वर के अधीन होता , तो संसार में कोई भी अव्यवस्था-रूप कर्म नहीं होता | इसलिए संसार में जो अव्यवस्था दिखाई देती है , उसका सत्य कारन ' मनुष्यो कि कर्म करने कि स्वतंत्रता होना ही है ', न कि ईश्वर कि सत्ता का न होना |

आपने अपने पक्ष कि पुष्टि में राजा का उद्धरण देकर अर्थापत्ति से यह दर्शाने का प्रयास किया है कि राजा के होने पर, नगर में चोरी, जारी , हिंसा से अव्यवस्था नहीं होती ऐसी बात नहीं है | न्यायकारी बलवान, धार्मिक , विद्वान , आदर्श राजा के तथा उसके बनाये संविधान एवं दण्ड-व्यवस्था होते हुए भी, राज्य में लोग स्वतंत्र से चोरी , जारी , हिंसा आदि कार्यो को कर लेते है | यद्यपि उनको यह ज्ञात होता है कि यह कार्य अनुचित है , संविधान विरुद्ध है तथा प्रतिफल में दण्ड भी मिलेगा | ऐसा प्रत्यक्ष देखते हुए भी यह नहीं कहते कि नगर का राजा नहीं है |

इसी प्रकार से ' अध्यापक-विद्यार्थी ' तथा ' माता-पिता व लड़को ' के विषय में दिए दृष्टांत को भी समझाना चाहिए | सभ्य, विद्वान , धार्मिक , गुरुजन तथा माता-पिता के, कक्षा तथा घर मे न रहने पर ही विद्यार्थी व बच्चे अव्यवस्था नहीं उत्त्पना करते है , बल्कि गुरुजन तथा माता-पिता के होते हुए भी अव्यवस्था करते है | उच्श्रृंखल , अनुशासनहीन , दुष्ट विद्यार्थी व् बच्चे तो , गुरुजन तथा माता-पिता के द्वारा समझाने, भय दिखाने  तथा दण्ड देने पर भी , परस्पर झगड़ते है, तोड़ फोड़ करते है, सिगरेट शराब पिते है जुआ खेलते है , व आचरहीनता सम्बन्धी कार्यो को करते है | तब क्या कक्षा में अध्यापक या घर में माता-पिता कि सत्ता का निषेध किया जा सकता है ? ऐसा तो मानते हुए नहीं बनता |

वास्तव में सिद्धांत यही है कि प्रत्येक मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है | कर्म करते हुए को राजा, गुरु , माता-पिता आदि पकड़ नहीं सकते | हाँ , दुष्ट कर्म कर लेने पर दण्ड देते है अथवा अच्छा कर्म करने के पश्चात पुरस्कार भी देते है | ऐसी ही स्थिति संसार में ईश्वर के विषय में जाननी चाहिए |
इस संसार का राजा , स्वामी -परमपिता ईश्वर है | ऐसे सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान , सर्वव्यापक , न्यायकारी पिता के होते हुए भी मनुष्य रूप पुत्र लोग अपनी स्वतंत्रता से हिंसा , चोरी , जारी अन्याय आदि कर्मोको करते है | यद्यपि वेद के माध्यम से ईश्वर ने विहित-निषिद्ध (कर्त्तव्य-अकर्तव्य)­ कर्मो का निर्देश इस सृष्टि के आदि में किया था, जो अबतक हमारे पास विद्यमान है | मनुष्यो के हृदयो में बैठा हुवा ईश्वर भाई , शंका , लज्जा उत्तपन्न करके पाप कर्मो को न करने कि प्रेरणा देता है | कुत्ता , बिल्ली , गधा , बैल , सूअर आदि दुखमय योनियों में पाप का फल जीवो को भोगते हुए भी दर्शाता है | फिर भी मनुष्य इन सब बातो के होते हुए भी अपनी स्वतंत्रता से अन्यायादि दुष्ट कार्य कर लेता है | ईश्वर ने मनुष्यो को कर्म करे में स्वतंत्र छोड़ा हुवा है | कर्म करते समय उसका हाथ नहीं पकड़ता | हाँ , कर्म कर लेने पर न्याय-अनुसार फल अवश्य देता है |

ईश्वर कि सत्ता तो सिद्ध ही है, क्योंकि उसे कार्यो में सर्वत्र व्यवस्था ही पायी जाती है | ईश्वर के कार्य है -- संसार को बनाना चलना, समय आने पर इसे नष्ट कर देना और सब जीवों के कर्मो का ठीक-ठीक फल देना | ईश्वर सूर्य, चन्द्र आदि को बनाता है | क्या इन्हे ईश्वर से अतिरिक्त कोई और बना सकता है | ईश्वर इन सूर्य , चन्द्र आदि को बनाकर चलाता भी है | ये सूर्यादि पदार्थ क्या एक मिनट के लिए भी चलते-चलते रुके है ? ईश्वर का कार्य है बीजो को बनाना, बीजो से वनस्पतिओं को बनाना | आम से आम होता है , केले से केला , गेहूँ से गेहूँ और चने से चना | ऐसे ही ईश्वर मनुष्यादि  प्राणियों के शरीरों को बनाता है | मनुष्य से मनुष्य और पशु से पशु का शरीर बनता है | क्या कभी इन कार्यो में फेर-बदल या अव्यवस्था होती है ? इसी प्रकार से संसार को नष्ट करना भी ईश्वर का ही कार्य है | एक समय आयेगा, जब सूर्य कि गर्मी समाप्त हो जायेगी, पृथ्वी में उत्पादन शक्ति नहीं रहेगी , तब संसार मनुष्यादि प्राणियों के लिए उपयोगी नहीं रहेगा | उस अवस्था में ईश्वर इसे नष्ट कर देगा | जीवोंको , अपने शुभ अशुभ कर्मोंके अनुरूप ही मिली मनुष्य , पशु, किट, पतंग आदि विभिन्न योनिया ईश्वर के न्याय को सिद्ध कर रही है | अतः ईश्वर के कार्यो में सर्वत्र व्यवस्था ही दिखती है |


ईश्वर का कार्य-क्षेत्र अलग है और जीवों का कार्यक्षेत्र अलग | ' ईश्वर के कार्यो को जीव नहीं कर सकता और जीवों के कार्यों को ईश्वर नहीं करता ' इस सिद्धांत कि चर्चा हम नास्तिक मत का खंडन भाग २ में कर चुके है | इसलिए जैसे राजा द्वारा संविधान बता देने पर भी नागरिक लोग अपनी स्वतंत्रता से अनुचित कार्य कर लेते है , इससे राजा कि सत्ता का निषेध नहीं होता | ऐसे ही ईश्वर द्वारा भी 'वेद' रूपी संविधान देने पर तथा मन में भय, शंका, लज्जा को उत्त्पन्न करने पर भी मनुष्य लोग अपनी स्वतंत्रता से संसार में चोरी, जारी, छल , कपट अन्याय आदि करके अव्यवस्था फैलाये, तो इसे ईश्वर कि सत्ता का निषेध नहीं किया जा सकता |

पिछला भाग =

नास्तिक मत खंडन भाग ३


अगला भाग =

नास्तिक मत खंडन भाग ५

नास्तिक मत खंडन ....................­ भाग ५



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नास्तिक व्यक्ति के विचार
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आस्तिक लोग बड़े बड़े सबेरे अँधेरे में ही उठकर बड़ी भावना से अपने इष्ट देव के समक्ष भजन गीत, माला कथा, पूजा पाठ, भेंट प्रसाद, ध्यान जप आदि धार्मिक क्रियाकांड करते हुए लम्बी लम्बी प्रार्थनाएं करते है की हे प्रभो! हमे धन धान्य से परिपूर्ण करो, हमे निरोग और स्वस्थ बनाओ, पुत्र पौत्र प्रदान करो, धंदा नौकरी दिलाओ, परीक्षा में पास करो, मुकद्म्मा जिताओ आदि आदि | जैसे एक अनाथ बच्चा, भूख प्यास, सर्दी गर्मी, लगने पर अपने माता-पिता को पुकारता है | किन्तु उसकी कोई नहीं सुनता. ऐसी ही स्थिति इस ईश्वर भक्त आस्तिकों को होती है | ये आस्तिक प्रतिदिन घंटो अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक कष्टो, अभावों, चिंताओं, दुखों का वर्णन बड़े कातर स्वर में कल्पित ईश्वर के समक्ष करते है , गिड़गिड़ाते है , रट है , किन्तु उनका कोई भी दुःख दूर नहीं होता | यदि वास्तव में ईश्वर होता तो निश्चित ही इन सभी ईश्वर भक्तो के कष्ट दुःख दूर हो जाते ; किन्तु नहीं होते , इससे यही सिद्ध होता है की ईश्वर की सत्ता नहीं है |

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आस्तिक व्यक्ति के विचार
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"आस्तिक लोग ईश्वर से प्रार्थना करते है, किन्तु उनके कष्ट दूर नहीं होते, यदि ईश्वर होता तो अवश्य ही प्रत्येक भक्त की प्रार्थना सफल होती " इतने मात्र से आपने मान लिया की ईश्वर की सत्ता नहीं है , ऐसा आपका मानना उचित नहीं है |

सर्व प्रथम तो यह जानने की बात है कि ' प्रार्थना ' किसी कहते है, तथा प्रार्थना कब करनी चाहिए | जो व्यक्ति प्रार्थना कि परिभाषा व लक्षण को नहीं जानते, वे ही ऐसी शंकाए किया करते है | ऋषीने ' प्रार्थना ' का स्वरुप निम्न प्रकार से दर्शाया है -- " अपने पूर्ण पुरषार्थ के उपरान्त, उत्तम कर्मो क सिद्धि के लिए परमेश्वर व किसी सामर्थ्य वाले मनुष्य का सहाय लेने को ' प्रार्थना ' कहते है " आर्योद्देश्यरमाला संख्या -२४ , लेखक स्वामी दयानंद सरस्वती |

जैसे कोई कुली या भार ढ़ोने वाला मजदूर स्वयं कुछ भी परिश्रम न करता हुआ , हाथ पर हाथ धरे खड़े रहे और अन्यो से यह कहे कि यह भार मेरे सिर पर रखवा दो तो कोई भी उसकी सहायता करने को उद्यत नहीं होता | जैसे एक विद्यार्थी अपने अधयापक द्वारा पढ़ाये गए पाठ को न तो ध्यानपूर्वक सुनता है, न लिखता है , न स्मरण करता है और न ही अध्यापक कि अन्य अच्छी-अच्छी बातो का पालन करता है , किन्तु जब परीक्षा का काल निकट आता है, तो गुरूजी , गुरूजी, कि रट लगा कर अपने अध्यापक से कहता है कि मुझे उत्तीर्ण कर दो | ऐसी स्थिति में कौन बुद्धिमान , न्यायप्रिय अध्यापक उस विद्यार्थी को, जिसने, परीक्षा के लिए कोई पुरषार्थ नहीं किया , अंक देकर उत्तीर्ण कर देगा ? कोई भी नहीं |

ठीक ऐसे ही ईश्वर, प्रार्थना करने वाले व्यक्ति की सहायता करने से पूर्व कुछ बातों की अपेक्षा रखता है | ईश्वर ने धन, बल, स्वस्थ्य, दीर्धायु , पुत्र आदि की प्राप्ति के लिए तथा अन्य कामनाओ की सफलता हेतु वेद में विधि का निर्देश किया है | जो व्यक्ति उन विधिनिर्देशों को ठीक प्रकार से जाने बिना और उनका व्यव्हार काल में आचरण किये बिना ही प्रार्थना करते है, उनकी स्थिति पूर्वोक्त्ता कुली या विद्यार्थी की तरह ही होती है | विधि रहित पुरुषार्थ हैं प्रार्थना को सुनकर अध्यापक रूपी ईश्वर प्रार्थी की कामनाओ को पूरा नहीं करता, क्योंकि ईश्वर तो महाबुद्धिमान तथा परमन्यायप्रिय है |

शुध्द ज्ञान और शुध्द कर्म के बिना की गयी प्रार्थना एकांगी है | वेदादि सत्य सहस्त्रो को यथार्थरूप से पढ़कर समझे बिना तथा तदनुसार आचरण किये बिना कितनी प्रार्थना की जाय वह प्रार्थना " प्रार्थना " की कोटि में प्रकार में आती नहीं |

जो ईश्वर भक्त ' प्रार्थना ' को केवल मंदिर जाने, मूर्ति का दर्शन करने, उसके समक्ष सर झुकाने, तिलक लगाने, चरणामृत पिने, पत्र-पुष्पादि चढाने, कुछ खाद्य पदार्थो को भेट करने, कोई नाम स्मरण करने, माला फैरने, दो भजन गा-लेने, किसी तीर्थ पर जाकर स्नान करने, कुछ दान-पुण्य करने तक ही सिमित रखते है, उनकी भी प्रार्थना सफल नहीं होती |

ऐसे प्रार्थी, प्रार्थना के साथ सुकर्मों का सम्बन्ध नहीं जोड़ते, व्यवहार काल में ईश्वर-- जैसा पुरुषार्थ, प्रार्थना करने वालो से चाहता है, वैसा व्यवहार वे नहीं करते है | यह प्रार्थना की असफलता में कारण बनता है | आश्चर्य तो इस बात पर होता है की जिन हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, मद्यपान , असंयम आलस्य , प्रमाद, आदि बुरे कर्मों से अशांति, रोग, भय, शोक, ज्ञान, मृत्यु , अपयश आदि दुखों की प्राप्ति होती है, उन्ही बुरे कर्मों को करता हुआ प्रार्थी सुख, शांति, निर्भयता, स्वास्थ्य, दीर्घ, आयु, बल, पराक्रम, ज्ञान, यश आदि सुखों को ईश्वर से चाहता है, यह संभव है ? कदापि नहीं |

पूर्ण पुरुषार्थ के पश्च्यात की गयी प्रार्थना यदि सफल नहीं होती तो शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार ३ कारण होते सकते है | वे है कर्म, कर्ता, साधन | देखे न्याय दर्शन शास्त्र २-१-५८ वाँ सूत्र ( न कर्मकर्तासधानवैगुण्यात् || ) जब ये तीनों ( = कर्म, कर्ता, और साधन ) अपने गुणों से युक्त होते हैं , तो प्रार्थना अवश्य सफल होती है, इसके विपरीत इन्ह तीनों में से किसी भी एक कारन में न्यूनता रहती है तो प्रार्थना कितनी ही क्यों न की जाये , प्रार्थी की प्रार्थना सफल नहीं होती |

उदाहरण के लिए एक रोगी व्यक्ति, अपने रोग से विमुक्त होने के लिए किसी कुशल वैद्य के पास जाता है और वैद्य से कहता है की मुझे स्वस्थ बनाइये | इस पर वैद्य उसके रोग का परिक्षण करके रोगी को निर्देश करता है की आमुक औषधि, इस विधि से, दिन में इतनी मात्र में खाओ तथा पथ्यापथ्य को भी बताता है की यह वस्तु खानी है और यह वस्तु नहीं खानी है, इसके साथ ही रोगी को दिनचर्या, व्यव्हार आदि के विषय में भी निर्देश करता है |

इतना निर्देश करने पर भी यदि रोगी, जो औषधि, जब जब जितनी मात्र में, जितनी बार लेनी होती है, तथा जिस विधि से लेनी होती है वैसा नहीं करता तो कर्म का दोष होता है | औषधि विषयक कार्यों को ठीक प्रकार से सम्पन्न करे, किन्तु रोगी-क्रोष, आलस्य, प्रमाद, चिंता, भय, निराशादी से युक्त रहता है, यह कर्ता का दोष है | रोगी स्वयं कितना ही निपुण क्यों न हो, औषधि नकली है, घटिया है, थोड़ी है, तो यह साधन का दोष है |


ठीक इसी तरह, किसी प्रार्थना करने वाले ईश्वरभक्त आस्तिक व्यक्ति की प्रार्थना सफल नहीं होती और उसके दुःख दूर नहीं होते तो यह नहीं मान लेना चाहिए की ईश्वर की सत्ता नहीं है | किन्तु ऐसी स्थिति में यह अनुमान लगाना चाहिए की उसके पुरुषार्थ में कुछ कमी है अर्थात कर्म, कर्ता , साधन में कही न कही न्यूनता या दोष है | उन न्यूनताओं व् दोषो को जानकर उनको दूर करना चाहिए | ऐसा करने पर प्रार्थी की प्रार्थना अवश्य सफल होगी | इसलिए उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है की ईश्वर की सत्ता है और वह दुखों को दूर भी करता है, किन्तु सभी प्रार्थना करने वाले भक्तों के दुखों को दूर नहीं करता केवल उन्ही भक्तो के दुखों को दूर करता है जो पुरुषार्थ सहित सच्ची विधी से ईश्वर की प्रार्थना करते है |


पिछला भाग  = नास्तिक मत का खंडन भाग ४